अध्याय आठ
आपसी संव्यवहार के आधार
आज सोशल मीडिया, मोबाइल फ़ोन व इन्सटेंट मेसेज प्लेटफ़ॉर्म की वजह से आपसी संवाद बहुत तीव्र गति से करना सम्भव हो गया है। लेकिन टेक्नोलॉजी के जहॉ फ़ायदे हैं बहीं नुक़सान भी है। आज कल लोगों में धैर्य की कमी हो गई है। लोग जजमेन्टल हो गये है बिना सोचे समझे सोशल मीडिया पर मेसेज फ़ॉरवर्ड करते है और लाईक डिसलाईक करते है। स्टार्टअप की दुनिया में प्रतिस्पर्धाओं का दौर चलता रहता है। मार्केट पर क़ब्ज़ा करने के लिए बहुत अफ़वाहों को फैलाया जा रहा है। इंटरप्रेन्योर को निरंतर अपनी टीम बनाने की ज़रूरत होती है। जैसे जैसे टीम बड़ती है वैसे वैसे आपसी विवाद भी बड़ते है। अधिकांश स्टार्टअप को फ़ाउन्डरों के साथ शुरू होते है ऐसे में जैसे जैसे कम्पनी में फ़ंडिंग आतीं है वैसे वैसे को फ़ाउन्डरों के मध्य पद नाम, शेयर होल्डिंग्स, पावर व पर्कस को लेकर विवाद होने लगते है और जब कम्पनी में पैसे का नुक़सान होता है तो एक दूसरे पर दोषारोपण करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह स्वस्थ संवाद के लिए बहुत घातक हो सकता है। बिज़नेस के लिए को फ़ाउन्डरों के अलावा पार्टनरशिप भी अलग-अलग लोगों के साथ की जाती है। ऐसे में पार्टनरों के साथ बातचीत बहुत महत्वपूर्ण होती है। स्टार्टअप की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि हम स्पष्ट बातचीत करें, रोल्स व रिस्पांसिबिलिटीस का स्पष्ट विभाजन हों तथा पार्टनरशिप डीडस बहुत डीटेल व विधि अनुसार बनाना चाहिए। लेकिन इस सब पूर्व सावधानियों के बावजूद हम हमेशा इतने सौभाग्यशाली नहीं होते है कि सब कुछ निर्वाध गति से चले। स्टार्टअप की सफलता में सह संस्थापकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। द फाउंडरस डायलेमा संस्थापक की दुविधाएँ: स्टार्टअप को डुबो सकने वाले नुकसानों का पूर्वानुमान लगाना और उनसे बचना में किताब के लेखक नोम वासरमैन ने लिखा है कि अक्सर एक नया व्यवसाय शुरू करने के उत्साह में उद्यमियों के सामने आने वाले सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक को कम महत्व दिया जाता है: क्या उन्हें अकेले आगे बढ़ना चाहिए, या व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए सह-संस्थापकों, कर्मचारियों और निवेशकों को लाना चाहिए? सिर्फ़ वित्तीय पुरस्कारों से ज़्यादा कुछ दांव पर लगा होता है। दोस्ती और रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। एक आशाजनक उद्यम की शुरुआत में गलत निर्णय इसके अंतिम विनाश की नींव रखते हैं।
द फाउंडर्स डिलेमास पहली किताब है जो उद्यमियों द्वारा शुरुआती निर्णयों की जांच करती है जो एक स्टार्टअप और उसकी टीम को बना या बिगाड़ सकते हैं।
एक दशक के शोध के आधार पर, नोम वासरमैन ने संस्थापकों के सामने आने वाली आम गलतियों और उनसे बचने के तरीकों के बारे में बताया। वह इस बात पर विचार करते हैं कि दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ मिलकर सह-संस्थापक बनना एक अच्छा विचार है या नहीं, संस्थापक टीम के भीतर इक्विटी को कैसे और कब विभाजित किया जाए, और कैसे पहचाना जाए कि एक सफल संस्थापक-सीईओ को कब बाहर निकल जाना चाहिए या निकाल दिया जाना चाहिए। वासरमैन बताते हैं कि कैसे विनाशकारी गलतियों का पूर्वानुमान लगाया जाए, उनसे बचा जाए या उनसे उबरा जाए जो संस्थापक टीम को विभाजित कर सकती हैं, संस्थापकों से नियंत्रण छीन सकती हैं और संस्थापकों को उनकी कड़ी मेहनत और अभिनव विचारों के लिए वित्तीय भुगतान के बिना छोड़ सकती हैं। वह स्टार्टअप को नियंत्रित करने और इसे विकसित करने के लिए सर्वोत्तम संसाधनों को आकर्षित करने के बीच प्रत्येक चरण में सावधानीपूर्वक संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं, और प्रदर्शित करते हैं कि क्यों आसान अल्पकालिक विकल्प अक्सर दीर्घकालिक में सबसे खतरनाक होते हैं।
संस्थापक की दुविधाएँ ट्विटर के इवान विलियम्स और पेंडोरा के टिम वेस्टरग्रेन जैसे संस्थापकों की अंदरूनी कहानियों पर आधारित हैं, जबकि लगभग दस हज़ार संस्थापकों पर मात्रात्मक डेटा का विश्लेषण करती हैं। लोगों की समस्याएँ स्टार्टअप में विफलता का प्रमुख कारण हैं। तो आपसी संव्यवहार आपके बिज़नेस को सफल एवं असफल बनाने की ताक़त रखता है। ऐसा नहीं है कि यह समस्या आज की है। यह समस्या मानव समाज में शुरू से विद्यमान रहीं है। मेरी समझ से महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में इस बात का समाधान प्रस्तुत किया कि हमें किस अवस्था के व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का मनुष्य से व्यवहार मैकेनिकल न हो कर बायोलॉजीकल होता है जो देश, काल व परिस्थिति में निरंतर बदलता रहता है। इसलिए महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र के 33 वें श्लोक में लिखा- “ मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।।”
महर्षि पतंजलि ने लोगों को चार वर्गों में विभाजित किया है तथा उनके साथ कैसा व्यवहार करना है- आनंदित व्यक्ति के प्रति मैत्री, दुखी व्यक्ति के प्रति करूणा, पुण्यवान के प्रति मुदिता तथा पापी के प्रति उपेक्षा का भाव रखना चाहिए। ओशो रजनीश योग सूत्र की व्याख्या में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते है कि पहले हमें अपनी स्वाभाविक मनोवृत्ति के समझना होगा। जब तुम किसी को प्रसन्न देखते हो, तो तुम ईर्ष्या अनुभव करते हो। दुखी अनुभव करते हो। यह स्वाभाविक है और महर्षि पतंजलि कहते है कि प्रसन्न के प्रति मैत्री भाव रखो। यह सरल नहीं है। हो सकता है कि यदि कोई हमारे क्षेत्र का स्टार्टअप सफलता से मुदित आनंदित हो और हम प्रसन्नता दिखाएं तो यह एक ऊपरी बात होगी। यह एक दिखावा या मुखौटा ही होता है। हम अपने अन्दर तो ईर्षा ही अनुभव करते है क्योंकि वह हमारा प्रतिद्वंद्वी है। हम बाज़ार में उससे प्रतिस्पर्धा कर रहे है। हो सकता है कि उसके पास हम से ज़्यादा संसाधन हो, ज़्यादा बाज़ार का हिस्सा हो, वह ज़्यादा सस्ता सप्लाई कर रहा हो और वह हमारे बिज़नेस को भविष्य में संकट में डल सकता हो तो ऐसी स्थिति में हमसे उस के प्रति ईर्ष्या का व्यवहार ही होगा। लेकिन यहाँ हमें समझना होगा कि प्रसन्नता धरती पर असीमित मात्रा में है। तो यह हमारा चुनाव हैं। ओशो कहते है कि यदि तुम दूसरे की प्रसन्नता में प्रसन्नता अनुभव करो तो तुम स्वयं की प्रसन्नता के लिए एक द्वार खोलते हो।
दूसरे महर्षि पतंजलि कहते है कि दुखी के प्रति करूणा का भाव रखना। यहाँ समझने की बात है सहानुभूति करूणा नहीं है। जब कोई स्टार्टअप असफल हो रहा है तो हम सामान्यतः सहानुभूति प्रकट करते है लेकिन अगर हम गहरे में देखे तो सहानुभूति प्रकट करते समय हम अंदर प्रसन्नता का अनुभव करते है। लेकिन जब हम करूणावश उसकी सहायता करते है तो इस अवस्था में हम न प्रसन्नता या दुख का अनुभव नहीं करते है तो करुणावान होना बिल्कुल अलग बात है तब सामने बाला भी हर्ट् फ़ील नहीं करता है।
तीसरी बात है पुणयवान के प्रति मुदिता का व्यवहार करना। जब कोई स्टार्टअप सफल होता है तो हम तुरंत उसकी आलोचना करने लगते है। बुराइयों को खोजने लगते है। और किसी न किसी तरह नीचे लाना चाहते है। क्योंकि हम किसी अन्य को पुण्यात्मा नहीं मान सकते। इससे हमारे अहंकार को चोट लगती है। तो यदि हम यह मानने को तैयार नहीं है कि कोई भला है, नेक है, हमसे अच्छी तरह बिज़नेस कर रहा है तो हम प्रसन्नता पूर्वक कैसे व्यवहार कर सकते है। लेकिन यदि किसी स्टार्टअप की सोशल मीडिया पर निंदा चल रही है तो हम सबूत नहीं माँगते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि वे बुरे है। सकारात्मक के लिए सबूत की ज़रूरत होती है लेकिन नकारात्मक के लिए किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होती। यह व्यवहार हम नेट पर सोशल मीडिया पर रोज़ देखते हैं। क्योंकि इससे हमारा अहंकार पोषित होता है। तो महर्षि पतंजलि कहते है कि पुण्यवान के प्रति मुदिता के भाव से व्यवहार करना अभी हमारे लिए स्वभाविक नहीं है लेकिन यदि हम अभ्यास करें तो अपना ही भला करेंगे। सफल लोगों से हमारी नेटवर्किंग अच्छी हो सकती है जिससे हमें हमारे बिज़नेस की सफलता में मदद मिलेगी।
चौथी बात महर्षि पतंजलि कहते है कि बुरे के प्रति उपेक्षा का भाव रखना। निंदा मत करना, बुराई नहीं फैलाना। यदि हम बुरे की निंदा करते है तो धीरे-धीरे हम उसी तल पर पहुँच जाते है। हम ग़लत के साथ आसानी से अशक्त हो जाते है। मनोवैज्ञानिक नियम यह है कि हम जिस किसी चीज़ पर ज़्यादा ध्यान देते है तो हम उससे सम्मोहित हो जाते है। यह एक आकर्षण बन जाता है। महर्षि पतंजलि आंतरिक मन के तंत्र को जान कर ही कहते है कि पापी के प्रति उपेक्षा का भाव रखना। बाहर से तुम क्या हो इसका ज़्यादा मूल्य नहीं है सवाल है कि हमारे आंतरिक सम्मोहन कैसे है वहीं हमारे जीवन के क्रम को निर्धारित करता है। तो बुराई के प्रति तटस्थ रहना, उपेक्षा का अर्थ भावशून्यता नहीं है, इसका इतना ही अर्थ है कि तुम मूल्यांकन न करो। ओशो कहते है कि जीवन इतना संश्लिष्ट है कि बुराई अच्छाई बन जाती है। ये परिवर्तनशील है। यदि सोशल मीडिया पर किसी स्टार्टअप की गड़बड़ी की कोई बहस चल रही है तो हमें अनावश्यक रूप से उसमें भाग नहीं लेना चाहिए। महर्षि पतंजलि की व्यवहार की यह सलाह मानने से बिज़नेस की सफलता के साथ साथ हमारे निजी सम्बन्ध भी मज़बूत होकर सफलता में योगदान देंगे।
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