अध्याय एक
बहुत कम व्यक्ति होते है जिनमें किसी काम में सफल होने की जन्म जात प्रतिभा होती है। लेकिन अधिकांश लोगों को यह खोज करना होती है और एक ऐसा ही प्रश्न आजकल बहुत पूछा जाता है कि स्टार्टअप कौन शुरू कर सकता है? कोई कैसे जान सकता है कि वह जीवन में कौनसे क्षेत्र में सफल होगा? यह बहुत गहन आत्मलोकन का विषय है।
'अथ' शब्द का शाब्दिक अर्थ है "अब' यह अथ कैरियर के चयन में व्यक्ति के जीवन में तब आता है जब वह या तो अपने जीवन में अनके नौकरियाँ करने के बाद पूरी तरह से निराश और हताश हो गया है या अभी वह विद्यार्थी है और अपनी शिक्षा पूरी कर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से बाहर आने वाला है। इन दोनों परिस्थितिया में हम एक ऐसे चौराहे पर अपने आप को खड़ा पाते है और यह निर्णय नहीं कर पाते है कि हमें कहाँ जाना है। यदि हमें उधमिता का पथ ज़्यादा आकर्षित कर रहा है तो अब यह क्षण आत्मलोकन करने का है कि यह आकर्षण कहाँ से आ रहा है? क्या यह आकर्षण लोगों की सफलता की कहानियां देख, सुन या पढ़ कर आ रहा है, या वास्तव में हम में वह मनोवैज्ञानिक कारक या तत्व है, जो उद्यमिता के लिए आवश्यक है। व्यक्ति जो कर्म करता है उसके मनोवैज्ञानिक लक्षण उस व्यक्ति की प्रकृति में ही होते हैं। इसलिए हम लोगों को देख कर, सुन कर व हाव भाव से लोगों की प्रकृति को बहुत हद तक जान जाते है।इस प्रश्न का सबसे अच्छा उधारण गीता के अध्याय 2 के श्लोक 54 में अर्जुन श्री कृष्ण से प्रशन करते है- “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥” अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण है स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?” ये ही वह प्रश्न है जो हमें जानना चाहिए कि उद्यमशील व्यक्ति के क्या लक्षण है ?
अब हम उद्यमिता के अनुशासन को प्रारम्भ करते है। हमारे सनातन धर्म में प्रकृति तीन गुणों सत्व,रज तथा तम से निर्मित मानी गई है। श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 13 वें श्लोक में चार वर्णों का उल्लेख करते हुए कहा है कि " चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।” अर्थात् प्रकृति के तीन गुण- सत्व, रज और तम गुणों के अनुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की है। सत्व गुण प्रधान व्यक्ति में शम, दम व तप कर्म की प्रवृति के कारण ब्राम्हण वर्ण, रजोगुण प्रधान शूरवीरता, तेज प्रवृति के कारण क्षत्रिय वर्ण, तमोगुण व रजोगुण के कारण व्यापार, उद्यम की प्रवृत्ति के कारण वैश्य वर्ण तथा तमोगुण की प्रधानता के कारण सेवक की प्रवृत्ति के कारण शूद्र वर्ण के कर्म करने में प्रवृत होता है। वर्ण व्यवाथा का अर्थ जाति व्यवस्था से बिलकुल भी नहीं है। न ही कर्म का निर्धारण व्यक्ति के जन्म से है, बल्कि प्राकृतिक गुणों की प्रधानता होने पर ही व्यक्ति अपनी प्रकृति व स्वभाव से अपना कर्म अर्थात् व्यसाय चुनता है। तभी वह न केवल अपने व्यवसाय में सफल होता है बल्कि अपने जीवन से संतुष्ट भी होता है। जब व्यक्ति की प्रवृति व वृत्ति में तालमेल नहीं रहता है तब वह अपने कर्म को कुशलता पूर्वक नही कर पाता है। वह हमेशा अपने व्यवसाय व जीवन से असंतुष्ट ही रहता है। क्योकि गीता में कृष्ण कहते है कि "योग: कर्मसु कौशलम् ” अध्याय 2 श्लोक 50 कुशलता पूर्वक कर्म करना ही योग है। जब मन, बुद्धि व शरीर एक लय व दिशा में कार्य करते है तो व्यक्ति सहज मन से कर्म कर पाता है। इसलिए जब व्यकि अपनी रुचि या शौक के काम करता है तो वह पूर्णतः सफल व जीवन में संतुष्ट होता है। मिर्जा गालिब ने कहा है कि 'जिस शख्स को जिस शगल का शौक हो, और वो उसमें बेतकल्लुफ़ उम्र वसर करे, तो उसका नाम एस है।"
जब हम लोगों की जीवनी पढ़ते है या बहुत सफल लोगों की बातें सुनते है तो वह अपनी मेहनत से अपने व्यवसाय में तो सफल दिखते है, लेकिन अपने जीवन को असफल ही मानते है। जैसे 20वीं शती के महानायक अमिताभ बच्चन ने अमिताभ बच्चन कॉपरेशन लिमिटेड की स्थापना की व कर्ज से घिर गये लेकिन अभिनय के क्षेत्र में सफलतम व्यक्ति है। धीरू भाई अंबानी क्लर्क के रूप में काम करने यमन गये लेकिन रिलायंस कंपनी बना के सफल उद्ययोगपति बने । महात्मा गांधी ने अपना कैरियर वैरिस्टर के रूप में शुरू किया लेकिन सफलता राजनेता के रूप में मिली। जेफ बेजोस ने अपना कैरियर फिटेल कंपनी में नौकरी से शुरू किया लेकिन सफलता अमेजन कंपनी से स्वयं का व्यवसाय करने पर ही मिली। जे. के. राउलिंग अनेक काम कर के असफल होती रही लेकिन हैरी पॉटर उपन्यास लिख कर सफल हो सकी। अल्बर्ट आइंस्टीन, अब्राहम लिंकन आदि की कहानियां भी अनेक असफ़लताओं के बाद सफल होने की है। बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन, स्टीवन स्पीलवर्ग, बॉल्ट डिज्नी आदि लोगों के उदाहरण बताते है कि जब उन्होंने अपनी प्रकृति के अनुरूप वृति का चयन किया तो सफल हो सकें। इसलिए अपनी आजीविका का चयन हमेशा अपनी प्रकृति के आधार पर करना चाहिए। आप जो काम स्वाभाविक ढंग से बिना तनाव के कर पाते है वहीं काम या क्षेत्र आपको अपना कैरियर चयन करने का संकेत देता है। यदि आप अपनी प्रवृति के विपरीत रुचि का चयन कर लेते है तॊ आप स्वयं दुःख और अशांति में जीवन जीते है। श्री कृष्णा गीता के तीसरे अध्याय के 35 वें श्लोक में कहते है कि ''स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः '' यहाँ स्वधर्म” का अर्थ है आपका स्वभाव या आपकी प्रवृति। अपने स्वभाव या प्रवृति में चलना श्रेयस्कर है।यदि आप क्षत्रिय वृति वाले है तो आप वैश्य वर्ण के कर्मों में सहजता अनुभव नही कर सकते । व्यक्ति को उद्यमी बनना है या नही उसे अपने स्वभाव के आधार पर ही निर्णय करना होगा अन्यथा आज अनेक असफल स्टार्टअप इस तरह के उदाहरण है जैसे मोनिका रास्तोगी व शशांक शेखर सिंघल का डनजो, मिलिंद शर्मा व नवनीत सिंह का पेपर टेप,रूपल योगेन्द्र का स्टेजिला, अरनव कुमार का जूमॊ आदि। लेकिन अकुंश सचदेवा 17 बार असफल होने के बाद 18वीं बार शेयर चेट बना कर सफल हो गये। विश्व में भी ऐसे अनेक उधारण है जहां बड़ी-बड़ी फंडिंग मिलने के बाद भी स्टार्टअप बंद हो गये। लेकिन अनेक लोग अनेक असफलताओं के बाद सफल हो गये जैसे; ट्यूटर के इवान विलियम्स, स्टार वर्क्स के हॉवर्ड शलूट्ज़, यूवर के ट्राविस कालानिक, व नेट फिल्किस के रीड हेस्टिंग्स आदि। ये लोग इस कारण सफल हो सके क्योंकि इन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ एक ही मार्ग का अनुसरण किया। श्री कृष्णा ने गीता के 2 अध्याय श्लोक 41 में कहा है “व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन, बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्” जिन की बुद्धि निश्चयात्मक होती है वे एक ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। लेकिन संकल्पहीन मनुष्य की बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त रहती है। गीता के अध्याय 4 के श्लोक 40 में श्री कृष्ण कहते है
“अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥40॥” इस का आशय है कि किन्तु जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है। संदेहास्पद जीवात्मा के लिए न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई सुख है। इसलिए यदि आपकी प्रकृति उद्यमी बनने की है तो आप “अथ उद्यमॊ योगानुशासनम्" प्रारम्भ कर सकते है।
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