Saturday, March 29, 2025

अथ उद्यमिता अनुशासन

अथ उद्यमिता अनुशासन 


डॉ.रवीन्द्र पस्तोर



अध्याय एक 

मेरी तीसरी पारी


बहुत कम व्यक्ति होते है जिनमें किसी काम में सफल होने की जन्म जात प्रतिभा होती है। लेकिन अधिकांश लोगों को यह खोज करना होती है कि वह जीवन में कौनसे क्षेत्र में सफल होंगे? यह बहुत गहन आत्मलोकन का विषय है।

मैंने अपने जीवन में चार तरह के बच्चे देखे है -पहली तरह के वे बच्चे है जिनमें जन्मजात कोई ना कोई प्रतिभा होती है। जो किसी ना किसी कौशल के साथ पैदा होते है। आजकल ऐसे बच्चे किसी ना किसी रियलिटी शो में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते दिख जाते है। दूसरी तरह के बच्चों के माँ बाप शुरू से निश्चित कर लेते है की उन्हें अपने बच्चों को क्या बनाना है। ऐसे बच्चों को उस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए माँ बाप अपनी हैसियत से बढ़ कर संसाधान जुटा कर बच्चों को सफल होने के लिए अपनी जी जान लगा देते है। अनेक बार ये बच्चे भी जीवन भर अपना कैरियर इसी क्षेत्र में बनाते है। तीसरे तरह के बच्चों को और न माँ बाप को पता होता है की बच्चा क्या करेगा। वह नदी की धारा की तरह जीवन में प्राकृतिक स्वभाव से बढ़ता जाता है और अपना रास्ता खुद बनाता है और सफल हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए बशीर बद्र का शेर है 

"हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।"

चौथी तरह के बच्चे व माँ बाप बहुत कन्फ्यूज़ होते है और वे बचपन से जीवन भर अनेक क्षेत्रों में हाथ अजमाते रहते है और कहीं नहीं पहुँच पाते है। 

मेरा जीवन बहुत साधारण तरीके से गांव में शुरू हुआ और में तीसरी श्रेणी का बच्चा था। मैं हमेशा से बहुत औसत दर्जे का विद्यार्थी था। जिसकी पाटी पूजा पिता जी ने गायत्री परिवार के मथुरा आश्रम में गुरूजी की गोद में बड़े अरमानों से करवाई थी, लेकिन उनकी असमय मृत्यु के कारण गांव के स्कूल में पहली कक्षा में नाम लिखाया गया। हालांकि पिता जी खुद अध्यापक थे, लेकिन उनका साथ बहुत अल्प काल का था। परिवार में खेती का मुख्य काम काज था जो नौकरों के भरोसे होता था। घर के लोग काम की निगरानी करते थे। घर का बड़ा लड़का होने के कारण मुझे पढ़ाई के साथ - साथ खेतों की निगरानी करना होती थीं। इस कारण खेती किसानी का व्यावहारिक ज्ञान बचपन से ही मिलने लगा। कालेज के दिनों में मुझे मेरे शिक्षकों ने जीवन में सफलता का मंत्र दिया की यदि जीवन में सफल होना है तो "भीड़ का हिस्सा मत बनो, हमेशा काम को अलग तरीके से करो।" इस ज्ञान ने जीवन को देखने की दिशा बदल दी। इस सीख के बाद से में चीजें अलग तरीके से करता हूँ।   

 'अथ'  शब्द का शाब्दिक अर्थ है "अब' यह अथ कैरियर के चयन में व्यक्ति के जीवन में तब आता है जब वह या तो अपने जीवन में अनके नौकरियाँ करने के बाद पूरी तरह से निराश और हताश हो गया है या अभी वह विद्यार्थी है और अपनी शिक्षा पूरी कर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से बाहर आने वाला है। इन दोनों परिस्थितिया में हम एक ऐसे चौराहे पर अपने आप को खड़ा पाते है और यह निर्णय नहीं कर पाते है कि हमें कहाँ जाना है। मेरे जीवन में पहला ‘अथ’ तब आया जब मुझे अपनी पढ़ाई के लिए विषयों का चयन करना पड़ तथा दूसरा ‘अथ’ आया जब  एम फिल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना कैरियर शुरू करना था। तब मेरा जीवन  मुझे नदी की धारा की तरह बहाता मेरे रिटायर्मेंट तक ले आया । जीवन की इन दोनों पारियों की कहानी फिर कभी।

जीवन में मुझे तीसरी पारी की शुरुआत अपने रिटायर्मेंट के बाद करना थी। जिसका निर्णय करने के लिए फिर तीसरी बार 'अथ' मेरे सामने था। इतना निश्चित था कि अब और नौकरी नहीं करना है। हमें उधमिता का पथ ज़्यादा आकर्षित कर रहा था। 

तो अब यह क्षण आत्मलोकन  करने का था कि यह आकर्षण कहाँ से आ रहा है? क्या यह आकर्षण लोगों की सफलता की कहानियां देख, सुन या पढ़ कर आ रहा है, या वास्तव में हम में वह मनोवैज्ञानिक कारक या तत्व है, जो उद्यमिता के लिए आवश्यक है, और एक ऐसा ही प्रश्न आजकल बहुत पूछा जाता है कि स्टार्टअप कौन शुरू कर सकता है? 

व्यक्ति जो कर्म करता है उसके मनोवैज्ञानिक लक्षण उस व्यक्ति की प्रकृति  में  ही होते हैं। इसलिए हम लोगों को देख कर, सुन कर व हाव भाव से लोगों की प्रकृति को बहुत‌ हद तक जान जाते है। इस प्रश्न का सबसे अच्छा उधारण है, गीता में अर्जुन श्री कृष्ण से प्रश्न करते है- “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥” 

अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण है स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?” ये ही वह प्रश्न है जो हमें जानना चाहिए कि उद्यमशील व्यक्ति के क्या लक्षण है ? 

अब हम उद्यमिता के अनुशासन को प्रारम्भ करते है। हमारे सनातन धर्म में प्रकृति तीन गुणों सत्व,रज तथा तम से निर्मित मानी गई है। श्री कृष्ण ने गीता में चार वर्णों का उल्लेख करते हुए कहा है कि " चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।” 

अर्थात् प्रकृति के तीन गुण- सत्व, रज और तम गुणों के अनुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की है। सत्व गुण प्रधान व्यक्ति में शम, दम व तप कर्म की प्रवृति के कारण ब्राम्हण वर्ण, रजोगुण प्रधान शूरवीरता, तेज प्रवृति के कारण क्षत्रिय वर्ण, तमोगुण व रजोगुण के कारण व्यापार, उद्यम की प्रवृत्ति के कारण वैश्य वर्ण तथा तमोगुण की प्रधानता के कारण सेवक की प्रवृत्ति  के कारण शूद्र वर्ण के कर्म करने में प्रवृत होता है। 

वर्ण व्यवाथा का अर्थ जाति व्यवस्था से बिलकुल भी नहीं है। न ही कर्म का निर्धारण व्यक्ति  के जन्म से है, बल्कि प्राकृतिक गुणों की प्रधानता होने पर  ही व्यक्ति अपनी प्रकृति व स्वभाव से अपना कर्म अर्थात् व्यसाय चुनता है। तभी वह न केवल अपने व्यवसाय में सफल होता है बल्कि अपने जीवन से संतुष्ट भी होता है। जब व्यक्ति की प्रवृति व वृत्ति में तालमेल नहीं रहता है तब वह अपने कर्म को कुशलता पूर्वक नही कर पाता है। 

वह हमेशा अपने व्यवसाय व जीवन से असंतुष्ट ही रहता है। क्योकि गीता में  कृष्ण कहते  है कि "योग: कर्मसु कौशलम् ” कुशलता पूर्वक कर्म करना ही योग है। जब मन, बुद्धि व शरीर एक लय व दिशा में कार्य करते है तो व्यक्ति सहज मन से कर्म कर पाता है। इसलिए जब व्यकि अपनी रुचि या शौक के काम करता है तो वह पूर्णतः सफल व जीवन में संतुष्ट होता है। मिर्जा गालिब ने कहा है कि 'जिस शख्स को जिस शगल का शौक हो, और वो उसमें बेतकल्लुफ़ उम्र वसर करे, तो उसका नाम एस है।’

जब हम लोगों की जीवनी पढ़‌ते है या बहुत सफल लोगों की बातें सुनते है तो वह अपनी मेहनत से अपने व्यवसाय में तो सफल दिखते है, लेकिन अपने जीवन को असफल ही मानते है। जैसे 20वीं शती  के महानायक अमिताभ बच्चन ने अमिताभ बच्चन कॉपरेशन लिमिटेड की स्थापना की व कर्ज से घिर गये लेकिन अभिनय के क्षेत्र में सफलतम व्यक्ति है। 

धीरू भाई अंबानी क्लर्क के रूप में काम करने यमन गये लेकिन रिलायंस कंपनी बना के सफल उद्ययोगपति बने । महात्मा गांधी ने अपना कैरियर वैरिस्टर के रूप में शुरू किया लेकिन सफलता राजनेता के रूप में मिली। 

जेफ बेजोस ने अपना कैरियर फिटेल कंपनी में नौकरी से शुरू किया लेकिन सफलता अमेजन कंपनी से स्वयं का व्यवसाय करने पर ही मिली। जे. के. राउलिंग अनेक काम कर के असफल होती रही लेकिन हैरी पॉटर उपन्यास लिख कर सफल हो सकी। 

अल्बर्ट आइंस्टीन, अब्राहम लिंकन आदि की कहानियां भी अनेक असफ़लताओं के बाद सफल होने की है। बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन, स्टीवन स्पीलवर्ग, बॉल्ट डिज्नी आदि लोगों के उदाहरण बताते है कि जब उन्होंने अपनी प्रकृति के अनुरूप वृति का चयन किया तो सफल हो सकें। 

इसलिए अपनी आजीविका का चयन हमेशा अपनी प्रकृति के आधार पर करना चाहिए। आप जो काम स्वाभाविक ढंग से बिना तनाव के कर पाते है वहीं काम या क्षेत्र आपको अपना कैरियर  चयन करने का संकेत देता है। यदि आप अपनी प्रवृति के विपरीत रुचि का चयन कर लेते है तॊ आप स्वयं  दुःख और अशांति में जीवन जीते है। श्री कृष्णा गीता में कहते है कि ''स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः '' यहाँ स्वधर्म” का अर्थ है आपका स्वभाव या आपकी प्रवृति। अपने स्वभाव या प्रवृति में चलना श्रेयस्कर  है। 

यदि आप क्षत्रिय वृति वाले है तो आप वैश्य वर्ण के कर्मों में सहजता अनुभव नही कर सकते। व्यक्ति को उद्यमी बनना है या नही उसे अपने स्वभाव के आधार पर ही निर्णय करना होगा अन्यथा आज अनेक असफल  स्टार्टअप इस तरह के उदाहरण है जैसे मोनिका रास्तोगी व शशांक शेखर सिंघल का डनजो, मिलिंद शर्मा व नवनीत सिंह का पेपर टेप,रूपल योगेन्द्र का स्टेजिला, अरनव कुमार का जूमॊ आदि। 

लेकिन अकुंश सचदेवा सत्रह बार असफल होने के बाद अठारहवीं बार शेयर चेट बना कर सफल हो गये। विश्व में भी ऐसे अनेक उधारण है  जहां बड़ी-बड़ी फंडिंग मिलने के बाद भी स्टार्टअप बंद हो गये। लेकिन अनेक लोग अनेक असफलताओं के बाद सफल हो गये जैसे; ट्‌यूटर के  इवान विलियम्स, स्टार वर्क्स  के हॉवर्ड शलूट्ज़, यूवर के ट्राविस कालानिक, व नेट फिल्किस के रीड हेस्टिंग्स आदि। ये लोग इस कारण सफल हो सके क्योंकि इन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ एक ही मार्ग का अनुसरण किया। 

श्री कृष्णा ने गीता में कहा है “व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन, बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्” जिन की बुद्धि निश्चयात्मक होती है वे एक ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। लेकिन संकल्पहीन मनुष्य की बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त रहती है। गीता में श्री कृष्ण कहते है 

“अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥” 

 इस का आशय है कि किन्तु  जिन अज्ञानी लोगों में न तो श्रद्धा और न ही ज्ञान है और जो संदेहास्पद प्रकृति के होते हैं उनका पतन होता है। संदेहास्पद जीवात्मा के लिए न तो इस लोक में और न ही परलोक में कोई सुख है। 

तब मैंने आत्मवलोकन किया की क्या अभी भी मुझ में रजोगुण बाकी है जो उद्यमिता के लिए आवश्यक तत्व है। हालांकि मुझे शासन में पुनः काम करने के अवसर थे तो मैने अपने आप से बार - बार यह सवाल किया कि क्या करना है? और हर बार जवाब था उद्यमिता। तो फिर पीछे मुड़ कर देखने का प्रश्न नहीं था। इसलिए अब शुरू करते है  “अथ उद्यमिता अनुशासन।”







अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय दो

उद्यमिता क्या है?


तो जब हमने निश्चय कर लिया कि अपना स्टार्टअप कर उद्यमी बनना है तो हमें जानना ज़रूरी था जो इस यात्रा में आने बाले पड़ाव है। उद्यमिता का मतलब है, किसी नए संगठन की शुरुआत करने की भावना। उद्यमिता में, कोई व्यक्ति किसी मौजूदा या भाविष्य के अवसर का पूर्वदर्शन करके, मुख्य रूप से कोई कारोबारी संगठन शुरू करता है। उद्यमिता में, एक तरफ जहां भरपूर मुनाफा कमाने की संभावना होती है, तो वहीं दूसरी तरफ़ जौखिम, अनिश्चितत‌ा और अन्य ख़तरों  की भी संभावन होती है।’जिस व्यवसाय में लाभ का कोई मार्ग न हो, वह व्यवसाय नहीं, बल्कि एक शौक है।’

अच्छी बात यह है कि उद्यमी पैदा नही होते है बल्कि बनते है। तो यदि आप चाहे तो अपने मनोविज्ञान में बदलाव कर आप अपनी  प्रकृति को बदल सकते है । आज ऐसे अनेक सफ़ल फस्ट जनरेशन के व्यवसायी है जैसे सचिन बंसल, विजय शेखार शर्मा, फाल्गुनी नायर, आदेश अग्रवाल, दिपिन्द्रर गोयल, कुनाल शाह, रितेश अग्रवाल, नितिन कामत, कैवल्य बोरा, कैलाश कातकर, पी.सी मुशतफ़ा, नारायण मूर्ति, देवी सेट्टी आदि। 

तो जब हमने य आत्म-अवलोकन करने के बाद पाया कि शायद हम में वह सब गुण नही है लेकिन फिर भी हम उन गुणों को विकसित करने की शुरुवात कर सकते है।


उद्यमिता शुरु करने की बाधाएँ

मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि यह रास्ता बहुत अकेला व अनिश्चितताओं से भरा होता है। स्टार्टअप शुरू करना बैसा तो बिलकुल नहीं होता जैसा प्रचारित किया जाता है। इस में आप अपने बॉस बिल्कुल नहीं होते यह यात्रा कहीं नौकरी करने के बिलकुल विपरीत होती है जहां चौबीस घंटे आप इसे जीते है। आप को उन बाधाओं से परिचित होना चाहिए ताकि आप यह मन बना सके कि इन बाधाओं का सामना आप को करना ही होगा। 


1. मनोवैज्ञानिक बाधाएँ - जो लोग ऐसे परिवारों से आते हैं जहां पहले से किसी तरह का व्यवसाय नही होता है उन व्यक्तियों को निन्म मनोवैज्ञानिक बाधाओं का सामना करना होता है-

  • असफलता का डर - यह सबसे बड़ी मानसिक बाधाओं मे से एक है जिसका सामन हर  उद्यमी करता ही है। इसीलिए कहा जाता है कि “डर के आगे जीत है” यही भावना उद्यमी को निवेश, प्रतिष्ठा या वित्तीय स्थिरता का जोखिम उठाने की प्ररणा देती है। प्रत्येक असफलता को मूल्यवान सीख के अनुभव के रूप में देखना चाहिए।

  • आत्म संदेह - कई उद्यमी निरंतर अपनी क्षमताओं पर संदेह अनुभव करते रहते है वह निरंतर अपने निर्णयों पर पुर्नविचार करते हैं। आत्म संदेह उद्यमी की सफलता के लिए एक प्रमुख बाधा बन सकता है। अतः उद्यमी को मेनटर, रोल माडल एवं एक नेटवर्क का सहारा लेना चाहिए। जहां वह अपने आत्म  संदेहों पर दूसरों की राय ले सकते है व दूसरों के अनुभवॊं से सीख कर आगे बड़ सकते है। 

  • पूर्णतावादी होना- कोई भी उद्यम या उद्यमी पूर्ण नहीं होता है। यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया होती है। यदि आप  उद्यम के संबंध में बहुत ज्यादा विश्लेषण करते है तो शायद आप अपना व्यवसाय कभी शुरु ही न कर सके। जितनी कम दूरी पर नजर रख आप चलेगे उतनी अधिक दूरी आप  तै कर सकते हैं। समय के साथ प्रगति करने और अपने काम को निखारने पर ध्यान होना चाहिए व निरंतर प्रयास व सुधार करते रहने पर ही  समय के साथ-साथ पूर्णता आती है। कोई भी जीवित व्याप्ति पूर्ण नही होता केवल मृत व्यक्ति ही पूर्णता को प्राप्त होता है।

  • अस्वीकृति का डर - कोई भी उद्यम एक परिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होता है, जहां बहुत सारे लोग भागीदार होते है। किसी भी उद्यमी को ग्राहकों, निदेशकों व भागीदारों से निरंतर संवाद करना होता है जहां अस्वीकृति ही अधिकांश समय आपको मिलतीं है। अत: अस्वीकृति का डर उद्यमी को मन से निकालना ही होता है। क्योंकि विश्व का कोई भी उद्यमी यह नही कह सकता कि उन्होने अस्वीकृतियों का सामन नही किया है। उद्यमी को 99% अस्वीकृत होने के लिए मानसिक रूप से तैयारी रखनी चाहिए। हेनरी फोर्ड फोर्ड मोटर कंपनी बनाने के पहले दिवालिया हो गये थे। जे.के. रोलिंग्स का उपन्साय हेरी पॉटर कितने सारे प्रकाशकों द्वारा अस्वीकृत  किया गया था। स्टीव जाँव को उनकी है कंपनी से निकल दिया गया। जेक मॉ को हरवार्ड विजनिस स्कूल द्वारा 10 बार  अस्वीकृत किया गया तथा 30 से ज़्यादा नौकरियों के लिए रिजेक्ट किया गया। अस्वीकृति उद्यमी की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा है तथा प्रत्येक अस्वीकृति ही सफ‌ल उद्यमी को सही चुनाव का अवसर देती है। 

  • इम्पोस्टर सिंड्रोम - यह वह भावान है जहां उद्यमी को लगता है कि वह सफलता के लायक नही है और उन्हें सफलता धोखे से मिली है। यह भाव निरंतर उद्यमी को मानसिक बाधा के तोर पर परेशान करता है। एक अध्ययन के अनुसार भारत  के 31% उद्यमी इम्पोस्टर सिंड्रोम से प्रभावित है। अपने हुनर को नकारना इम्पोस्टर सिन्ड्रोम का प्रमुख लक्षण है। फेसबुक की पूर्व सीईओ शेरिल सैडवर्ग ने कहा था की हार्रवर्ड यूनिवर्सिटी में उन्हें हर परीक्षा के बाद लगता था कि उनका टेस्ट खराब हुआ है  व उन्हें अच्छे नम्बर संयोगवश मिले है। मिशेल ओबामा, स्टारबक्स के सी.ई.ओ हॉवर्ड शुल्ज भी इस भावना से पीड़िता रहें है। इस समस्या से आपका आत्मविश्वास डिग जाता है। अतः अपनी कबलियत पह‌चाने व अपने आप को सफलता का श्रेय देना सीखे।

  • फोकस ही कमी - उद्यमियों के दिमाग में हमेशा बहुत सारे विचार और सामने बहुत सारे काम चलते रहते हैं जो उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहते है। इस बाधा को दूर करने के लिए स्पष्ट लक्ष्य, प्राथमिकताएँ, व समय प्रबंधन आवश्यक होता है। एक स्टेज के बाद उद्यमी को अपने काम का बँटवारा कर टीम के सदस्यों को वह सभी काम सौंप देना चाहिए जो वे स्वतंत्र रूप से अधिक कुशलता से कर सकते है। 

  • अकेलापन - उद्यमी को अपना रास्ता ख़ुद बनाना पड़ता है। वे खग का दृष्टिकोण व ख़ुद की शर्तें बनाते है। इसलिए उद्यमी अक्सर अपने आप को अकेला पाता है। जब आप अपनी टीम के साथ होते है तो आप को लगता है कि आप की रेंक के कारण आपको बहिष्कृत कर दिया गया है। अकेलापन आपके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। 

  • अज्ञात का डर - जब उद्यमी अपने लक्ष्य निर्धारित करता है तो उन लक्ष्यों तक पहुँचने के अनेक रास्ते हो सकते है। इन बहुत से अनजान रास्तों में से एक का चुनाव करना हमेशा डरावना होता है। क्योंकि आप का एक ग़लत चुनाव पूरे बिज़नेस या पूरी टीम के भविष्य को दांव पर लगा सकता है। अज्ञात के भय से उबरकर ही उद्यमी सफल हो सकता है। 

2.पारिवारिक बाधाएँ - नया व्यवसाय शुरू करना हमेशा रोमांटिक, रोमांचक व चुनौती पूर्ण होता है। इसलिए जिन परिवारों में पूर्व से व्यवसाय नहीं हो रहा होता है वे परिवार नौकरी जैसा सुरक्षित कैरियर की सलाह देते है तथा जिन परिवारों में पूर्व से व्यवसाय हो रहा है वे परम्परागत व्यवसाय को करने की सलाह देते है। जबकि शुरू में उद्यमी को सफलता के लिए परिवार का समर्थन आवश्यक होता है अन्यथा उसे अंदर व बाहर दोनों जगह संघर्ष करना पड़ता है। यदि परिवार समर्थन करता है तो उद्यमी को अनेक लाभ होते है। 

  • तनाव कम होना- उद्यमी हमेशा तरह-तरह के तनावों से निरंतर जूझते रहते है। हालाँकि सफल होने के लिए तनाव एक आवश्यक कारक है। लेकिन लम्बे समय तक अधिक तनाव के कारण मस्तिष्क की प्रतिक्रिया प्रणाली शरीर में कार्टीशोल व एंडरनल हार्मोन्स का स्राव करती है जिससे स्पष्ट सोच व निर्णय लेने की क्षमता, जोखिम उठाने की क्षमता व उत्पादकता प्रभावित होती है। उद्यमी अवसाद ग्रस्त हो जाते है। यदि यह तनाव लम्बे समय तक चलता है तो उच्च रक्तचाप, ह्रदयघात, मांसपेशियों की समस्या या डायबटीज़ जैसी परेशानियाँ बड़ जाती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। हार्मोनल असंतुलन के कारण अनेक प्रकार की समस्याएँ हो सकती है। एक उद्यमी ने हाल ही में अपने व्हटएप से  अपने सभी ग्रुपस में “आल आफ गुडनाइट अण्ड स्वीट ड्रीम्स” का सन्देश भेज कर आत्महत्या कर ली तो दूसरे उद्यमी ने दस पेजों का सुसाइड नोट लिखा जिसमें उन्होंने फ़ैक्ट्री लगाने से सुसाइड की स्थिति तक पहुँचने की दास्तान लिखी कि किसने सहायता की, किसने धोखा दिया, किसने भुगतान नहीं किया, कौन परेशान कर रहा था, शासन के किसी विभाग से कोई मदद नहीं मिली आदि। हालाँकि मीडिया या सोसल मीडिया पर इस तरह की घटनाओं की ज़्यादा चर्चा नहीं होती है। इन स्थितियों से उद्यमी को अकेले ही लड़ना पड़ता है। लेकिन जब कैफ़े काफ़ी डे के मालिक ने आत्महत्या की तो देश में खूब चर्चा हुई। एक अध्ययन के अनुसार हमारे देश में 49% उद्यमी तनाव से ग्रस्त पाए गए हैं। तो ऐसे में परिवार का साथ होता है तो उद्यमी संघर्ष कर सफल हो जाता है। 

  • लचीलापन बड़ता है- लचीलापन असफलताओं से उबरने में मदद करता है। लचीलापन उद्यमी का बहुत बड़ा गुण है। 

  • भावनाओं पर नियंत्रण- उद्यमी को भावनाओं के अतिरेक से हमेशा बचना चाहिए। श्री कृष्ण ने गीता में कहा है “सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ” अर्थात् उद्यमी को  सुखदुःखको समतुल्य समझकर उनमें  रागद्वेष न करके तथा लाभहानिको और जयपराजयको समान समझकर काम करना चाहिए। इसलिए परिवार उद्यमी को एक सुरक्षित स्थान दे सकता है। 

3. क़ानूनी बाधाएँ - कोई नया उद्यम शुरू करना आसान काम नहीं होता है। हमारे देश में उद्यम को शुरू करने के लिए इतने अधिक विभागों से लाइसेंस व अनुमतियाँ लेनी होती है जो किसी नये उद्यमी के लिए बहुत मुश्किल होता है। विश्व बैंक समूह द्वारा जारी ईज आफ डूईग बिज़नेस- कारोबार सुगमता रेंकिग प्रणाली के तहत वर्ष 2019 में भारत को 190 देशों में 63 वाँ स्थान मिला था। इस रेंकिग में न्यूज़ीलैंड पहले, सिंगापुर दूसरे तथा डेनमार्क तीसरे स्थान पर रहे। हालाँकि भारत ने इस मामले में अनेक कदम उठाए हैं तथा वर्ष 2023-24 का बजट पेश करते समय वित्त मंत्री ने इस सूचकांन में रैकिंग सुधारने की सरकार की प्रतिवद्धता दुहराई है। फिर भी उद्यम शुरू करने  के पूर्व बिज़नेस लाइसेंस विभिन्न प्रकार के रजिस्ट्रेशन, सुरक्षा परमिट, एसटी रजिस्ट्रेशन, एम एस एम ई रजिस्ट्रेशन व स्टार्टअप इण्डिया रजिस्ट्रेशन आवश्यक है। 

हलाकि कोई भी नया उद्यम कानून के दायरें में ही शुरू हो सकता है, लेकिन विग़त वर्षी मैं विश्व भर में ऐसे स्टार्टअप शुरु किये गये जो किसी क़ानून के दायरे में नहीं आते थे जेसै यूवर के पास एक भी टैक्सी नही है, एयर बी एन बी के पास एक भी कमरा नही है, जमेटो के पास एक भी रेस्टोरेन्ट  नही है आदि । नये उद्यमी मागते है कि शासन से परमीशन मांगने के बजाय छमा मांगना ज्यादा आसान होता है। इसी रणनीति पर बहुत से उद्यम प्रारंभ हो सकें है। 

लेकिन जो लोग पर‌मापरगत उद्यम करना चाह‌ते है उनके सामने कानूनी बाधाएँ  हमेशा रहेगी जिन को पार करना कठिन, श्रमसाध्य, खर्चीला व अत्याधिक समय लेने वाला है, लेकिन विभिन्न   राज्यों की सरकारों ने सिंगल विंडो सिस्टम लगा कर इन बाधाओं को दूर करने की कोशिश निरंतर जारी है।  

अब राज्य सरकारों  के बीच में निवेश को आकृषित करने, रोज़गार के अवसर उत्पन करने, व राज्य की आय बढ़ाने लिए निजी उद्यमियों को तरह तरह की सुविधाए देने की होड़ लगी है। भारत में हमेशा से हो व्यवसाय को बहुत अच्छी नजर से नही देखा गया लेकिन पहलीबार भारत के प्रधामांत्री ने स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इण्डिया जैसे कार्यक्रम शुरू का उद्यमियों के प्रति समाज व परिवार में एक सकारात्मक छवि बनाने का प्रयाय  किया है। इन कारण आज युवाओं में नोकरी करने के स्थान पर अपना व्यवसाय शुरू की समझ बड़ती जा रही है तथा भारत में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इको सिस्टम पिछले 9 वर्षों में खड़ा हुआ है। 


4 . व्यवसाविक  बाधाएँ- नये उद्यमी को अपना कारोबार शुरु करने के लिए पूर्व से स्थापित औद्योगिक घरानों, बहु राष्ट्रीय कम्पनियों, व व्यापारिक संस्थानों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। बाजार में स्थापित कंपनीय तरह तरह की बाधाएँ व समस्या उत्पन्न करती है। जिस से नई कम्पनियां या तो प्रतिष्पर्धा से बाहर चली जाये या बड़ी कम्पनियॊं में विलय कर लें या बंद हो जाय। 

हमारे देश में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का नेटवर्क बहुत प्रभावी न होने के कारण अधिकांश सेक्टरों में बड़ी कम्पनियों  का एकाधिकार है। किसी कारोबार को शुरु करना उतना  मुश्किल नहीं है, जितना मुशिकल है उसे आसानी से आग़े बढ़ाते रहना । 

व्यापार मैं प्रतिस्पर्धा हमेशा अच्छी होती है तथा उपभोक्ताओं के हित मे होती है लेकिन जब असमान संगठनॊं वाली कंपनियॊं के बीच स्पर्धा हो तो मुश्किल होता है। यदि कोई उद्यमी सोचता है कि उसका कोई प्रतिद्वंदी नही है और वह दौड़ में अकेला है, तो यह उसकी सबके बड़ी भूल है।  व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा जीतने  के लिए आवश्यक है खुद पर भरोसा रखे, प्रतियोगी से बेहतर आईडिया ले कर आप प्रोडक्ट की समझ रखें, ग्राहक को भगवान माने, फाईनेंस पर नज़र रखे, टीम की कद्र  करें फीडबैक लें  व दें, मार्केटिंग की नवीनतम तकनीकी को अपनाऐं तथा हमेशा बदलाव के लिए तैयार रहें। 

यदि आप शुरुआत  कर रहे है तो आप को बहुत कम संसाधनों  के साथ कार्य शुरू करना है इसलिए आप कभी भी अपने प्रतिभागी का मॉडल अपना कर प्रतियोगिता नही जीत सकते। आप को अपने प्रतिभागी से अलग बिज़नस मॉडल तैयार करना होगा  तथा उन कामों को चिहित करना होगा जो बाजार की मांग है व उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएँ देने के लिए आवश्यक है। 

उन  कार्यों को आप को अपने बिज़नस मॉडल शमिल करना होगा बाज़ार में जो बड़ी कंपनीय है उनकी मुश्किल यह है कि वह आसनी से बदलाव को लागू नही कर पती है जब कि नई व छोटी कंपनियों मे इतना अधिक लचीलापन होता कि वह कभी भी बदलाव के लिए तैयार रहती है और यह ताक़त उन्हें जीतने में मदद करती है। सन् 1980 के दौरान कोल वार कोला विरुद्ध पीप्सी, मैकडोनाल्ड विरुद्ध बरगर किंग, फोर्ड विरूद्ध जनरल मोटर, डॉकन डोनेट विरुद्ध स्टारबक्स, नाइकी विरुद्ध रीवोक आदि ऐसी ही लड़ाईया है जो व्यापारिक जगत में प्रसिद्ध है। कोलगेट, पोप्सीडेंट तथा दंत कांती, मैगी और पतंजलि आटा नूडल, पारले व ब्रिटानिया, आदि की जँग अभी जारी है। नये स्टार्टअप में पेटीएम, ओला, उबर , योयो, एयर वी एन वी, ज़ेप्टो, ब्लिंकिट , बिगबास्केट आदि की प्रतियोगिताएँ इसी तरह की है। 










अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय तीन 


उधम की सफलता का आधार 

 

डॉ युवाल नोआ हरारी ने अपनी किताब 'सेपियन्स' में बताया है कि लगभग एक लाख साल पहले घरती पर मानव की कम से कम छः प्रजातियां बस्सती थीं, लेकिन आज सिर्फ होमो सेपियन्स ही बचे है। प्रभुत्व  की इस जंग में आखिर हमारी प्रजाति ने कैसे जीत हासिल की ? हमारे भोजन खोजी पूर्वज शहरों और साम्राज्यों की स्थापना के लिए क्यों एक जुट हुए?  कैसे हम ईश्वर, राष्ट्रों, और मानव अधिकारों में विश्वास करने लगे? कैसे हम दौलत, किताबॊ और क़ानून में भरॊसा करने लगे? और कैसे हमने नौकरशाही, समय-सारणी और उपभोक्तावादी संस्कृति को अपना लिया? इन सब सवालों का जवाब  है साझा विश्वास। 

कोई भी उद्यम तभी सफल व बड़ा बन सकता है जब उस संस्थान की टीम व उसके उप‌भोक्ता उम उद्यम की कहानी पर भरोसा करें। किस्से गढ़ जाते हैं। लेकिन किस्से गढ़ने आसान नहीं होते। फिर उन किस्सों पर लोगों का विश्वास क़ायम करना अधिक कठिन होता है। इसे कल्पित वास्तविकता कहते है। कम्पनियां - उद्यम इसी तरह स्थापित होती है। साझा विश्वास कम्पनियों की सफलता की वास्तविक ताकत बनती है। फिर छोटी कम्पनी बड़ी कम्पनियों को समाप्त कर देती है। ये सफल कंपनीय सामूहिक विश्वास को अधिक से अधिक लोगा में फैलाते है और काल्पनिक वास्तविकता का निर्माण करते हैं।

हम एक गहरी भ्रांति में जीते है-आशा की भ्रांति में। आदमी आत्म वंचनाओं के बिना जी नहीं सकता । नीत्से ने कहा है कि आदमी सत्य के साथ नहीं जी सकता है; उसे चाहिए सपने, भ्रान्तियाँ, और कई तरह के झूठ। मानव मन को गहराई से समझ कर ही आज कम्पनियों को सफल बनाया जा सकता है। न्यूरो मार्केटिंग, विपणन और तंत्रिका विज्ञान के मिश्रण से जुड़ा विज्ञान है। इसका मक़सद, उपभोगताओं के व्यवहार, भावनाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझना होता है। इस जानकारी का इस्तेमाल, विपणन रणनीतिया बनाने और बेहतर उत्पाद विकसित करने में किया जा रहा है। 

इस प्रकिया में आई ट्रैकिंग और आई गेजिंग, प्रभावी पैकेजिंग, रंग मनोविज्ञान, विज्ञापन द‌क्षता, निर्णय थकान, संतुष्टि का मूल्यांकन, हानि से बचना, एंकरिंग, गति और दक्षता तथा छपी हुई  प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जा रहा है। 

नीर ईयाल ने अपनी किताब हूक्ड में अनेक कम्पनियों जैसे फ़ेसबुक, पिंटरेस्ट , टूईटर,येलप,ब्लागिंग आदि कम्पनियों के उद्धरण दे कर हेविट, टिगर, एक्शन व रिवार्ड के सिस्टम को बना कर कैसे कम्पनियों को सफल बनाया है। टिकटोक जैसी कम्पनियों छोटे छोटे व्हिडिओ बना कर करोड़ों लोगों को रोज़ व्हिडिओ बना कर डालने की आदत का गुलाम बना दिया है। आज करोड़ों लोग अपने जीवन के करोड़ों घन्टे रील देखने या सोशल मीडिया पर बिताते है। मोबाइल गेम निर्माता कम्पनियों गेम खेलने वाले लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है। 

हार्वर्ड विश्वविधालय के प्रो हेराल्ड जाटमैन कहते है कि मनुष्य का अवचेतन मन ही 95% खरीददारी के निर्णय करता है। स्वतंत्र इच्छा की अवधारणा पर डॉ युवाल नोआ हरारी कहते  है कि किसी व्यक्ति को विकल्प चुनने की स्वतंत्रता एक मिथ्या अवधारणा है। क्योंकि उपभोक्ता के व्यवहार पर तरह-तरह के प्रयोग व अध्ययन किए जा रहे है और अब कम्पनियाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स का इस्तेमाल कर रही हैं और यह कोशिश है कि उपभोक्ता के ख़रीदारी के निर्णय को कैसे प्रभावित किया जाय कि उसे पता भी न चले कि कोई और उनके व्यवहार को प्रभावित कर उनकी इच्छा की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रहा है। 

बाज़ार में ग्राहकों को मनाने के लिए ग्राहकों की बातें सुनना, सकारात्मक भाषा का उपयोग करना, ग्राहकों को विकल्प देना, उपहार देना, पीछे छूट जाने का डर दिखाना, आदि तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसलिए सभी इन्टरनेट आधारित कम्पनियाँ के पास हमारी इतनी अधिक जानकारी है और वह हमारे व्यवहार के सम्बन्ध में बिल्कुल सही सही गड़ना कर अनुमान लगाने में माहिर हो गई है कि अब न केवल ख़रीदने के निर्णय प्रभावित किए जा रहे है बल्कि देशों के चुनावों को भी सफलतापूर्वक प्रभावित किया गया है। 

दरअसल, हाल ही में फेसबुक के फाउंडर और मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने 'जो रोगन पॉडकास्ट' में शिरकत की थी। इस दौरान उन्होंने चुनावों पर एक विवादास्पद टिप्पणी की थी। मेटा के सीईओ ने कहा था कि कोविड-19 महामारी के बाद भारत समेत दुनिया के कई देशों में चुनाव हुए और कई सरकार हारी हैं, जिसमें भारत भी शामिल है. उन्होंने कहा था कि ये हार दिखाती हैं कि महामारी के बाद लोगों का भरोसा कम हुआ है। इस टिप्पणी पर भारी विवाद चल रहा है। 

इन्टरनेट डाटा बेच कर कम्पनियाँ खरबों रूपये कमा रहीं है। आज बिना तकनीक का इस्तेमाल किये किसी भी बिज़नेस को सफल नहीं बनाया जा सकता है। आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपनी कोई पोस्ट या फ़ोटो अपलोड कर तत्काल आप को उससे संबंधित विज्ञापन दिखाने लगते है, ईमेल व मैसेज आने लगते है। और तो और जब में अपने मोबाइल फ़ोन पर यह लेख टाईप कर रहा हूँ तो मेरा मोबाइल मेरा मन पड़ कर अगले शब्द का सजेशन दे रहा है। यदि में कोई शब्द टाइप करने में गलती करता है तो मोबाइल उस शब्द को लाल लाइन से दिखा देता है। यह सब इतनी तीव्रता से होता है कि मुझे लगता ही नहीं कि मेरे विचार मेरा मोबाइल कम्पनियाँ पड़ कर स्टोर कर रहीं है। तो आज आप को तकनीकी का जितना अधिक ज्ञान होगा और आप अपने बिज़नेस में जितना उपयोग करते है आप की सफलता की सम्भावना उतनी ज़्यादा है क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा भौतिक जगत में न हो कर वर्चुअल आभासी दुनिया में है। 

व्यापार जगत में, असफलता एक अपेक्षित संस्कार बन गई है। आप हर समय सुनते हैं कि कैसे दस में से नौ नए व्यवसाय असफल हो जाते हैं। आप सुनते हैं कि आपके व्यवसाय के सफल होने की संभावना न के बराबर है। आप सुनते हैं कि असफलता चरित्र का निर्माण करती है। लोग सलाह देते हैं, "जल्दी असफल हो जाओ और बार-बार असफल हो जाओ।" हवा में इतनी असफलताओं के साथ, आप इसे साँस में लेने से खुद को रोक नहीं सकते। साँस अंदर मत लो। आँकड़ों से मूर्ख मत बनो। दूसरे लोगों की असफलताएँ बस यही हैं: दूसरे लोगों की असफलताएँ। अगर दूसरे लोग अपने उत्पाद का विपणन नहीं कर सकते, तो इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर दूसरे लोग टीम नहीं बना सकते, तो इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर दूसरे लोग अपनी सेवाओं की कीमत ठीक से नहीं लगा सकते, तो इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर दूसरे लोग अपनी लागत से ज़्यादा नहीं कमा सकते ... तो आप समझ गए होंगे। एक और आम ग़लतफ़हमी: आपको अपनी गलतियों से सीखने की ज़रूरत है। आप गलतियों से वास्तव में क्या सीखते हैं? आप सीख सकते हैं कि आपको फिर से क्या नहीं करना चाहिए, लेकिन यह कितना मूल्यवान है? आप अभी भी नहीं जानते कि आपको आगे क्या करना चाहिए। अपनी सफलताओं से सीखने के साथ इसकी तुलना करें। सफलता आपको असली गोला-बारूद देती है। जब कोई चीज़ सफल होती है, तो आपको पता होता है कि क्या काम आया--और आप इसे फिर से कर सकते हैं। और अगली बार, आप शायद इसे और भी बेहतर तरीके से करेंगे। असफलता सफलता के लिए कोई शर्त नहीं है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के एक अध्ययन में पाया गया कि पहले से ही सफल उद्यमियों के फिर से सफल होने की संभावना कहीं अधिक है (उनकी भविष्य की कंपनियों की सफलता दर 34 प्रतिशत है)। लेकिन जिन उद्यमियों की कंपनियाँ पहली बार विफल हुईं, उनकी सफलता दर लगभग उतनी ही थी जितनी पहली बार कंपनी शुरू करने वाले लोगों की: सिर्फ़ 23 प्रतिशत। जो लोग पहले विफल हुए, उन्हें उतनी ही सफलता मिली जितनी उन लोगों को जिन्होंने कभी प्रयास ही नहीं किया। * सफलता वह अनुभव है जो वास्तव में मायने रखता है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए: यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे प्रकृति काम करती है। विकास पिछली असफलताओं पर नहीं रुकता, यह हमेशा उसी पर आधारित होता है जो सफल रहा। आपको भी ऐसा करना चाहिए।

क्या आपको वाकई दस लोगों की ज़रूरत है या अभी के लिए दो या तीन लोग ही काफी होंगे?

क्या आपको वाकई 500,000 रुपये की ज़रूरत है या अभी के लिए 50,000 रुपये काफ़ी हैं?

क्या आपको वाकई छह महीने की ज़रूरत है या आप दो महीने में कुछ बना सकते हैं?

क्या आपको वाकई एक बड़े ऑफ़िस की ज़रूरत है या आप कुछ समय के लिए ऑफ़िस स्पेस शेयर कर सकते हैं या घर से काम कर सकते हैं?

क्या आपको वाकई एक गोदाम की ज़रूरत है या आप एक छोटा स्टोरेज स्पेस किराए पर ले सकते हैं या अपने गैरेज या बेसमेंट का इस्तेमाल कर सकते हैं या इसे पूरी तरह से आउटसोर्स कर सकते हैं?

क्या आपको वाकई विज्ञापन खरीदने और एक पीआर फ़र्म को काम पर रखने की ज़रूरत है या फिर ध्यान आकर्षित करने के लिए कोई और तरीका है?

क्या आपको वाकई एक फ़ैक्टरी बनाने की ज़रूरत है या फिर आप अपने उत्पादों के निर्माण के लिए किसी और को काम पर रख सकते हैं?

क्या आपको वाकई एक एकाउंटेंट की ज़रूरत है या फिर आप क्विकेन का इस्तेमाल करके खुद ही यह काम कर सकते हैं?

क्या आपको वाकई एक आईटी विभाग की ज़रूरत है या फिर आप इसे आउटसोर्स कर सकते हैं?

क्या आपको वाकई एक पूर्णकालिक सहायता व्यक्ति की ज़रूरत है या फिर आप खुद ही पूछताछ संभाल सकते हैं? क्या आपको वाकई खुदरा स्टोर खोलने की ज़रूरत है या आप अपना उत्पाद ऑनलाइन बेच सकते हैं? क्या आपको वाकई फैंसी बिज़नेस कार्ड, लेटरहेड और ब्रोशर की ज़रूरत है या आप इन चीज़ों को छोड़ सकते हैं? आप समझ गए होंगे। शायद अंततः आपको बड़ा, ज़्यादा महंगा रास्ता अपनाना पड़े, लेकिन अभी नहीं। किफ़ायती होने में कोई बुराई नहीं है। जब हमने अपना पहला उत्पाद लॉन्च किया, तो हमने इसे सस्ते में किया। हमें अपना खुद का कार्यालय नहीं मिला; हमने दूसरी कंपनी के साथ जगह साझा की। हमें सर्वरों का बैंक नहीं मिला; हमारे पास सिर्फ़ एक था। हमने विज्ञापन नहीं किया; हमने अपने अनुभव ऑनलाइन साझा करके प्रचार किया। हमने ग्राहकों के ईमेल का जवाब देने के लिए किसी को काम पर नहीं रखा; कंपनी के संस्थापक ने खुद ही उनका जवाब दिया। और सब कुछ ठीक रहा। महान कंपनियाँ हमेशा गैरेज में शुरू होती हैं। आपकी भी हो सकती है

आह, स्टार्टअप। यह एक खास किस्म की कंपनी है, जिस पर बहुत ध्यान दिया जाता है खासकर तकनीक की दुनिया में। स्टार्टअप एक जादुई जगह है। यह एक ऐसी जगह है, जहाँ खर्च किसी और की समस्या है। यह एक ऐसी जगह है, जहाँ राजस्व नामक वह कष्टप्रद चीज़ कभी कोई मुद्दा नहीं बनती। यह एक ऐसी जगह है, जहाँ आप दूसरों के पैसे तब तक खर्च कर सकते हैं, जब तक कि आप अपना खुद का पैसा बनाने का कोई तरीका नहीं निकाल लेते। यह एक ऐसी जगह है, जहाँ व्यवसाय भौतिकी के नियम लागू नहीं होते। इस जादुई जगह की समस्या यह है कि यह एक परीकथा है। सच्चाई यह है कि हर व्यवसाय, नया या पुराना, बाजार की ताकतों और आर्थिक नियमों के एक ही सेट द्वारा संचालित होता है। राजस्व आता है, खर्च जाता है। लाभ कमाएँ या खत्म हो जाएँ। 

स्टार्टअप इस वास्तविकता को अनदेखा करने की कोशिश करते हैं। वे ऐसे लोगों द्वारा चलाए जाते हैं, जो अपरिहार्य को टालने की कोशिश करते हैं, यानी, वह क्षण जब उनके व्यवसाय को बड़ा होना है, लाभ कमाना है, और एक वास्तविक, टिकाऊ व्यवसाय बनना है। जो कोई भी व्यवसाय के प्रति "हम भविष्य में लाभ कमाने का तरीका खोज लेंगे" वाला रवैया अपनाता है, वह हास्यास्पद है। यह रॉकेट जहाज बनाने जैसा है, लेकिन यह कहकर शुरू करना कि "चलो मान लेते हैं कि गुरुत्वाकर्षण मौजूद नहीं है।" लाभ के मार्ग के बिना व्यवसाय व्यवसाय नहीं है, यह एक शौक है। इसलिए स्टार्टअप के विचार को बैसाखी के रूप में इस्तेमाल न करें। इसके बजाय, एक वास्तविक व्यवसाय शुरू करें। वास्तविक व्यवसायों को बिल और पेरोल जैसी वास्तविक चीजों से निपटना पड़ता है। वास्तविक व्यवसाय पहले दिन से ही लाभ के बारे में चिंता करते हैं। वास्तविक व्यवसाय यह कहकर गहरी समस्याओं को नहीं छिपाते कि "कोई बात नहीं, हम एक स्टार्टअप हैं।" एक वास्तविक व्यवसाय की तरह काम करें और आपको सफल होने का बेहतर मौका मिले। 




अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय चार 


कौन सा उधम  कैसे किया जाए? 


बहुत सारे युवा आज अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहते है। लेकिन अधिकांश लोगों को पता नहीं होता कि उन्हें करना क्या है? या कई लोगों के मन में बहुत अस्पष्ट विचार होता है। किसी भी स्टार्टअप का जन्म विचार से ही होता है। तो हमें अपने स्टार्टअप को भी अपना मानस पुत्र ही मानना चाहिए। 

ब्रम्हाण्ड की रचना का विचार सबसे पहले ब्रह्मा जी के मन में ही आने की कथा है। महात्मा बुद्ध ने कहा है कि मन सभी वृत्तियों का पुरोगामी है। इसलिए हमें मन की वृत्तियों की समझ होनी चाहिए। आधुनिक मनोविज्ञान आज यह सब समझने का प्रयास कर रहा है। लेकिन महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में मन को चार आयामों को माना है- मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार। किसी भी विचार की अनुभूति सबसे पहले चित्त में होती है। जिसे महर्षि पतंजलि ने चित्त वृत्ति कहा है। चित्त की पाँच वृत्तियों का उल्लेख है- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा व स्मृति। 

तो स्टार्टअप के संस्थापक को यह समझना चाहिए कि स्टार्टअप का विचार किस भाव दशा में कौनसी वृत्ति से आया है। तो उद्यमी को यह समझना चाहिए कि उद्यम हो जो विचार उनके मन में आप है वह किस वृति व कोन सी भावदशा में आया है।हर उद्यम की शुरुआत एक आइडिया या विचार से होती है। जो लोग अपना स्टार्टअप शुरु करना चाहते है उन्हें सभी लोग उनके आईडिया के बारे में पूछते है। सामान्यतः, जो दूसरे की समस्या होती है वह उद्यमी के लिए बिजनिस करने का अवसर या आइडिया होता है ।

यह समस्या स्वयं की, परिवार की या समाज की हो सकती है। जो व्यक्ति जितना संवेदनशील, चेतनावान होता है वह अपने आस-पास की समस्याओं को आसानी से महसूस कर पाता है। सामान्यतः लोग, समस्या को देख कर अनदेखा करते है और सोचते है कि इस समस्या का समाधान खोजना उनका काम नही है। इस समस्या का समाधान या तो सरकार को खोजना चाहिए या किसी अन्य व्यक्ति को। ऐसे दृष्टिकोण वाले व्यक्ति उद्यमी होने की श्रेणी में नही आते है। उद्यमी होने के लिए पहली शर्त है कि जब भी वह जहां भी कोई छोटी से छोटी समस्या को देखे तो उसका समाधान खोज कर क्रियान्वित करने की सोचें । 

वही सच्चा उद्यमी  स्वभाव का व्यक्ति है। यह व्यक्ति रजोगुण प्रधान होता है। आज जो बड़े व्यावसाय खड़े हुए है वह इसी तरह के लोगॊं द्वारा खड़े किए गए हैं। क़रीब एक दशक पहले सैन फ्रांसिस्को में किराय के घर में रहने वाले ब्रायन चेस्की , जो गेब्बिया व नाथन ब्लेचारज़िक अपने घर  का किराया नहीं दे पा रहे थे व खुद खर्च के लिए पैसा नहीं होता था। तब उन्हें अपने एयर मैड्रेस किराये पर दे कर अपना खर्च निकालने का विचार आया  और इसी विचार ने 30 बिलियन डालर की कंपनी बना दी। जिसका नाम एयर बी एन बी है। इस छोटे से विचार से उत्पन्न कम्पनी आज 220 देशों में काम करती है।कोरोना काल में जब लोगॊं के कारोबार डूब रहे थे और धंघे चौपट हो रहे थे, तब कैवल्य वोहरा व आदित पलीचा को खाना, किराना व अन्य जरूरी सामान लोगो के घरॊं में 10 मिनिट में पहुँचने का विचार  आया। इसी विचार से जेप्टो कम्पनी की शुरुआत हुई जो आज 140 करोड डालर के वैल्यूएशन वाली कंपनी बन गई है। 

इस विचार के कारण ही भारत मैं क्विक कॉमर्स कम्पनियों का जन्म हुआ। इसी तरह नौकरी डॉट काम की शुरुआत जीव बिखचंदानी ने की जिसके बाद हमारे देश में स्टार्टअप कल्ट की शुरुआत हुई। फणींद्र शर्मा व उनके दोस्तों ने बस के टिकिट ऑनलाइन बेचने के विचार पर रेडबस डाँट कॉम की शुरुआत की। इसी तरह आर्देशिर गोदरेज को वर्ष 1897 में मुम्बई में चोरियां बड़ने की खबर आखबर में पड़ कर ताला बनानें का विचार आया तब उन्होंने  एक छोटी सी  जगह में ताल बनाने की गोदरेज कम्पनी की शुरुआत की जो आज 50 देशों में  व्यापार कर रही है तथा जिसका बाज़ार मूल्य रूपये 1.5 लाख करोड है। 

ऐसी कहानियां आज हर कम्पनी के बारे में उपलब्ध है जिन्हे जानकार आपको लगेगा कि केवल एक व्यक्ति की समस्या से भी बहुत बड़ा उद्यम खड़ा हो सकता है। अकेले भारत मे आज 1,40,803 स्टार्टअप पंजीकृत है। जिन्होंने 15.53 लाख नौकरियां सृज़ित की है।अब यह प्रश्न है आप कैसे जाने कि कौन सा विचार आप के लिए सही है, जिस पर कम कर आप अपना कारोबार प्रारंभ कर सकते है। तो इसका सीधा सरल जवाब है कि आप अपने विचार से जिस समस्या का समाधान करना चाहते है तो उसके लिए क्या लोग भूग़तान करने को तैयार है? यदि हाँ तो आप सही रास्ते पर है और आप का विचार “बहुत अच्छा” है। इसके लिए आप अपनी पढ़ाई व नौकरी छोड़ कर अपनी बचत का निवेश कर सकते है। लेकिन इस विचार को उद्यम में बदलने के लिए निम्न क़दम उठाना आवश्यक हैं:- 

  1. पहला कदम - वास्तविक समस्या की पहचान - जब आप अपनी स्वयं के “भोगा हुआ यथार्थ” के समाधान के लिए कोई विचार विकसित करते है तो वह समस्या वास्तविक समस्या  ही होती है।आप दिन में स्वप्न नहीं देख रहे होते है। ऐसे अनेक उदाहरण है जैसे मेलिना पर्किन्स ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी में पार्ट टाइम पढ़ाने का काम करती थी उन्हें बच्चों को “डिज़ाइन सॉफ्टवेयर सिखाना” था। उस समय उपलब्ध सॉफ्टवेयर बहुत महँगे तथा जटिल थे। तब उनके मन में एक विचार आया कि क्या एक ऐसा साफ्टवेयर तैयार किया जाना चाहिए जो किसी भी बिना डिज़ाइन सीखे  व्यक्ति को डिज़ाइन बनाना सिखा सके।इसी विचार से कैनवा एप का जन्म हुआ। जिसका आज  सभी लोग आसानी से उपयोग करते है।  लेकिन ऐसे बहुत उद्यम है जो पर्यात फण्डिंग होने के बावजूद भी असफल हो गये। इनमें वायजू, फूड पान्डा, फ्रीचार्ज, दू‌धवाला व डील शेयर आदि है। आई बी एम के एक अध्यापन के अनुसार भारत में शुरू होने वाले स्टार्टअप में से 90% विफल हो जाते है। विफलता की दर फिनटेक में 75%, प्रौद्योगिकी में 63%, रियल स्टेट में 48% व निर्माण में 20% है। अमेरिका के एक इन्वेस्टर विल ग्रोस ने अपने टेड टॉक में स्टार्टअप की सफलता सही समय पर 42%, टीम व कियान्वयन पर 32% आइडिया पर 28% बिज़नस मॉडल्स पर 24% तथा फडिंग पर 14% निर्भर होती है।

  2. दूसरा कदम- अपने लक्षित ग्राहकों को परिभाषित करना - यदि आपके पास एक “बहुत अच्छा” विचार है तो दूसरा चरण यह है कि आप अपने लक्षित ग्राहकों की पहचान करें। जब उद्यमी किसी विचार से प्यार करने लगता है तो उसे लगता कि हर कोई आप के उत्पाद या सेवा खरीदना चाहेगा। लेकिन यह सच नहीं होता है। जैसे भारत में कोई उद्यम जब शुरु करता है या कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी अपने उत्पाद बेचना चाहते है तो सामान्यत: लोग भारत की एक सौ व्यालीस  करोड़ जनसंख्या को अपना उप‌भोक्ता बताते है। जब कि यह सत्य नही होता है।  कोई आपका उत्पाद या सेवा तभी ख़रीदेगा जब वह उस की किसी ज़रूरत या समस्या की पूर्ति करती है। दूसरे उस की क्रय  शक्ति आप का मूल चुनाने की हो। तीसरे वह उसके पहुँच में समीप उपलब्ध हो तथा उनकी धार्मिक व सामजिक मान्यताओं के विपरीत न हों। जैसे  पॊपुल रिसर्च ऑन इंडियाज़ कंज्यूमर के अनुसार वर्ष 2004-2005 में जहां 30% परिवार गरीब थे वे 2030 तक केवल 6%रहेंगे।  मध्यम वर्ग 2004-2005 में 14%. आबादी थी जो 2030 तक 46% हो जायेगी। अमीरों की आय रूपये 30 लाख वार्षिक, मध्यम वर्ग की आय रूपये 5.30 लाख वार्षिक निम्न वर्ग की आय रूपये 1.25 लाख से 5 लाख वार्षिक व गरीब की आय रूपये 1.25 लाख वार्षिक से कम आकलित की गई है। इन आँकड़ों के आधार पर आप के मूल्य पर कितने प्रतिशत लोग आप के उत्पाद या सेवाओं को क्रय कर सकेंगे वह आँकड़ा आप के लक्षित वर्ग का हो सकता है। इस पर अन्य कारकों के प्रभाव का आकलन कर आपके “कुल बाज़ार” के आकार की गणना की जाना चाहिए। 

  3. तीसरा कदम- प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण करना- यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है तो यह ग़लत मान्यता है। यदि कोई समस्या है तो कोई किसी न किसी तरह का समाधान उपलब्ध करवा रहा होगा। तो आप अपने प्रतिस्पर्धी की नक़ल कर सफल नहीं हों सकते। आप को समस्या के मौजूदा सभी समाधान उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियों के बिज़नेस माडलों को समझना होगा और अंतरालों गैप को पहचान कर बेहतर समाधान उपलब्ध कराने की कोशिश करना चाहिए। यदि आप किसी दूसरे देश या किसी अन्य सेक्टर के आईडिया की नक़ल कर सफल नहीं हो सकते। जैसे कृषि क्षेत्र में कृषि आदान सप्लाई चैन को समझें बिना जिन्होंने एग्रोटेक फ़िलिप कार्ट या अमेजन कम्पनियों की नक़ल का स्टार्टअप शुरू किए थे वे आज या बन्द हो गए या बहुत अधिक घाटा उठा कर चल रहें है उन्होंने अधिकांश प्रदेशों में कारोबार बंद कर दिए हैं तथा अनेक वर्टिकल्स बंद कर कर्मचारियों की छटनी कर दी है। क्योंकि इन लोगों को लगा कि वह फ़ीडिंग की दम कर कम क़ीमत पर माल बेच कर पूर्व की सप्लाई चैन को तोड़ देंगे। लेकिन वे करोड़ों करोड़ रुपए बर्बाद करने के बाद भी सफल नहीं हो सके। क्योंकि जितना मार्जिन इलेक्ट्रॉनिक, फ़ैशन, व सौंदर्य प्रसाधन के सामान बेचने में जो मार्जिन है उसना मार्जिन कृषि आदान के उत्पादों में नहीं है। कृषि उत्पादक बेचने के मण्डियों के विकल्प के तौर पर विकसित ई-कॉमर्स ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म सफल नहीं हो पा रहे है। क्योंकि हमारे देश के 85% किसान लघु व सीमांत श्रेणी के है वे बहुत कम मात्रा में कृषि आदान क्रय करते है व उनका उत्पाद भी बहुत कम मात्रा में होता है तथा उसकी गुणवत्ता भी अलग-अलग होती है। इन कारणों के कारण आज तक कोई भी एग्रीटेक स्टार्टअप सही विकल्प प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो सका है। 

  4. चौथा कदम- बाज़ार में अवसरों की तलाश- जब आप अपने लक्षित ग्राहकों के आधार पर बाज़ार के आकार का आकलन कर लेते है तब आपको यह समझना होगा कि इस लक्षित बाज़ार के कितने प्रतिशत लोगों को आप आकर्षित कर सकते है और अपने व सेवाओं को बेच सकते है। इसके लिए उपभोक्ताओं के व्यवहार को समझना चाहिए। अर्ली एडेप्टर उपभोक्ताओं की पहचान कर शुरू में उन्हें टार्गेट किया जाना चाहिए फिर फ़ॉलोअर उपभोक्ताओं को। अपने बिज़नेस माडल में बदलाव के लिए शुरू से ही आँकड़ों का विश्लेषण कर स्टार्टअप की स्थिरता बड़ा कर लाभ को बड़ा सकते है। 

  5. पाँचवा कदम- प्रोडक्ट मार्केट फ़िट की तलाश - प्रारंभ से ही बहुत बड़ी लागत लगा कर काम शुरू करने के स्थान पर आईडिया को छोटे स्तर पर टेस्ट कर प्रोडक्ट मार्केट फ़िट की तलाश करनी चाहिए। ग्राहकों की संख्या विस्तार करना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। ग्राहकों के दर्द के बिन्दुओं को समझने के लिए प्रारंभिक ग्राहकों का फ़ीडबैक लेना चाहिए। कोविड के समय एडटेक स्टार्टअप व ई-कॉमर्स स्टार्टअप ने बहुत निवेश उठा कर बहुत व्यापक स्तर पर काम शुरू किया। उन्हें उम्मीद थी कि वे ग्राहकों की आदतों को बदल में सफल होंगे। लेकिन लाँक डाउन ख़त्म होने पर ग्राहक अपनी पुरानी आदत के अनुसार आफलाइन चले गये। प्रोडक्ट मार्केट फ़िट को सस्ते में बेच कर नहीं परखा जा सकता है। 

  6. छटवॉ क़दम- परिवर्तन, परिवर्धन व पुनरावृत्ति - आज डिजिटल युग में मार्केट ईनटेलीजेनस व ग्राहकों की प्रतिक्रिया के आँकड़ों को एकत्र करना, विश्लेषण करना व आगे के अनुमान लगाने के लिए बहुत सारे टूल्स उपलब्ध है। इसलिए स्टार्टअप को शुरू से ही अपनी ताक़त और अवसरों को पहचानें, कमज़ोरियों व जोखिमों को कम करने के लिए आँकड़ों पर नज़र रखने के साथ साथ अपने प्रतिद्वंद्वी की रणनीति व नई टेक्नोलॉजी को अपनाने के लि स्टार्टअप को बहुत लचीलापन अपनाने की कोशिश करना चाहिए। बाज़ार में क्या चलेगा क्या नहीं, परीक्षण व तुष्टियों को खोजने की प्रवृत्ति आप की सफलता की सम्भावना को बढ़ा देती है। 

स्टार्टअप हमेशा से अनिश्चितता से भरा होता है। जिसमें निरंतर ऊपर-नीचे जाने का खेल चलता रहता है। प्रतिदिन नई चुनौतियों का सामना करना, टीम को उत्साहित रखना, समस्याओं का समाधान निकलना आप को लीडर बनाता है। असफलताओं व नकार को सीखने व अनुभव लेने की प्रक्रिया समझना व पैसे का धोखा खानें को सीखने की क़ीमत जानना आपको हमेशा सकारात्मक रखता है। यदि कोई विचार सम्पूर्ण प्रयास करने के बाद भी बाज़ार में सफल नहीं हो पा रहा है तो साहिर लुधियानवीं के गीत “ वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा“ याद करें व इस विचार को छोड़कर कुछ और करे। हमारे देश में भगवान विष्णु का एक चित्र हर घर में होता है जिसमें वे क्षीर सागर में शेषनाग के उपर शांति से लेटे है तथा सर्प के हज़ार सिर उनके सिर के ऊपर  है  तथा लक्ष्मी पाँव दवा रहीं है। इसका अर्थ है कि जो स्टार्टअप का संस्थापक बाज़ार की उथल-पुथल में हज़ार समस्याओं में शांति से अपने काम को करना जारी रखेगा तो सफलता उसके कदम चूमेगी। एक स्टार्टअप संस्थापक को हरफ़नमौला बनाना पड़ता है। उसे यह गाना चाहिए- में ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुवें में उड़ाता चला गया।” बिजिनेस का आईडिया ऐसा होना चाहिये जो आपकी अनुपस्थिति में लाभकारी ढंग से चल सके। 












अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय पाँच 


उद्यमी को मन शांत रखने के साधन 

 

उद्यमी को मनोविज्ञान की समझ होनी आवश्यक है। क्योंकि स्टार्टअप के जीवन में इतने ज़्यादा उतार-चढ़ाव होते है तथा इन्टर्नप्रोनर शुरू में अपने काम और जीवन में अंतर न रख पाने के कारण मन को प्रभावित होने से बचा नहीं पाता है। कभी-कभी किसी किसी इन्टर्नप्रोनर का मन पर नियंत्रण समाप्त हो जाने पर भयानक परिणाम होते है। वह चौबीसों घन्टा इसी विषय पर सोचता रहता है। श्री कृष्ण ने गीता में मनुष्य के नास होने की प्रक्रिया को समझाते हुए कहते है कि - 

ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |

सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 

विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्यों की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह मूढ़भाव हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है। 

बायजू स्टार्टअप की कहानी इस प्रक्रिया का जीता जागता उदाहरण है। वर्ष 2007 में बायजू रबीन्द्रन ने ट्यूशन के काम में मिली सफलता से उत्साहित होकर वर्ष 2011 में थिंक एण्ड लर्न नाम से एक स्टार्टअप कम्पनी शुरू की तथा आन लाइन पढ़ाने के लिए बायजू का प्लेटफ़ार्म शुरू किया। यह प्रयोग बहुत सफल रहा तो वर्ष 2015 में बायजू का एप लाया गया। वर्ष 2020 में बायजू विश्व का सर्वाधिक मूल्यवान एडटेक स्टार्टअप बन गया। कम्पनी का वैल्यूशन रूपये 85,000 करोड़ हो गया। तब उन्होंने आकाश एजुकेशन सर्विस को रूपये 7,300 करोड़ में ख़रीदा, व्हाइट हेड जूनियर, टापर व आई रोबोट ट्यूटर कम्पनियाँ ख़रीद करने के लिए बिलियन डॉलर से अधिक का क़र्ज़ लिया। बायजू ने कभी ऑर्गेनिक ग्रोथ की नहीं सोची।  एक समय कम्पनी की मासिक आय रूपये 30 करोड़ थी तथा खर्च रूपये 150 करोड़ था। ऐसे हालात में लोन चुकाने का बोझ बड़ता गया और कम्पनी का वैल्यूशन 22 विलियन डालर से घटाकर 5 विलियन डालर रह गया। इस वर्ष कम्पनी को रूपये 4,589 करोड़ का घाटा हुआ। 

इसके बाद कम्पनी के अकाउंट में गड़बड़ी सामने आने लगी। लोन देने वालों ने कोर्ट्स केश दायर कर दिया। कर्मचारियों की लगातार छँटनी की गई , अनेक देशों में काम बंद कर दिया। प्रवर्तन निदेशालय ने कम्पनी में छापा मारकर केश दर्ज किया। बायजू रबीन्द्रन भारत से दुबई जा कर रहने लगे। उनकी स्वयं की वेल्थ रूपये 17,545 करोड़ से शून्य हो गई। आज कम्पनी पर देश व विदेश में अनेक कोर्ट्स में प्रकरण चल रहे है। 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा - “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।” आदमी का केवल अकेले उसका चेतन मन ही नहीं है बल्कि उसके पास नौ गुना अचेतन मन भी है। इसलिए हमारी अनुभूतियाँ, विचार, व निर्णय अवचेतन मन से प्रभावित होते है। 

मन को शांत रखने के लिए महर्षि पतंजलि ने ‘अभ्यासवैराग्याअभ्यांतन्निरोधः’ अभ्यास व वैराग्य के सतत अभ्यास से मन शांत रखा जा सकता है। इसलिए स्टार्टअप के संस्थापक को स्वयं व स्टार्टअप को अलग समझने के लिए अभ्यास करना चाहिए। जिससे उनकी अशक्ति कम हो जाती है और वैराग्य भाव बड़ने से कम्पनी अधिक कुशलता से चला सकते है। वैराग्य का आशय आलसी पन नहीं है बल्कि इसका मतलब है अनासक्ति। स्टार्टअप से अनासक्ति का भाव अवचेतन व अचेतन तक ले जाने के लिए सतत अभ्यास की आवश्यकता है। इस बात की बुद्धि गत समझ काम नहीं आती है। हर स्टार्टअप शुरू करने वाला यह अच्छे से समझता है कि स्टार्टअप उससे है वह स्टार्टअप नहीं है। 

लेकिन जब कम्पनी में गड़बड़ होती है तो यह समझ ग़ायब हो जाती है। उस का दिमाग़ हमेशा सोचता रहता है, नींद नहीं आती, खाना नहीं पचता, ब्लड प्रेशर बड़ जाता है, व हार्मोन की गड़बड़ी होने से धीरे-धीरे वह अवसाद में चला जाता है। क्योंकि अनासक्ति चेतन मन के तल पर तो समझ रहा है लेकिन अवचेतन व अचेतन मन के तल पर यह समझ नहीं होतीं है। कोई विचार अचेतन का हिस्सा तभी बनता है जब वह निरंतर दुहराया गया हो। जैसे आप का नाम। यदि आप किसी भीड़ बाली जगह में कितनी गहरी नींद में सो रहे हो और कोई आप का नाम पुकारे तो आप जाग जाते है, जबकि दूसरे गहरी नींद में सो रहे होते है। इसी तरह तुम्हारी मात्रभाषा है। इसलिए सैनिक, व खिलाड़ी निरंतर अभ्यास करते है। जब हम तैरना, साइकिल चलाना या गाड़ी चलाना सीख लेते है तो फिर मशल मेमोरी से ही कर पाते है। 

कम्पनियाँ लगातार विज्ञापन दिखातीं है। क्योंकि विज्ञापन से वह प्रोडक्ट आपके अचेतन का हिस्सा बन जाता है और जब आप माल में ख़रीदारी करने जाते है तो आप वहीं प्रोडक्ट उठा कर लाते है। क्योंकि जब कोई याददाश्त बन जाती है तो उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। इसलिए योग परंपरा में अभ्यास पर इतना ज़ोर दिया गया है। मन को शांत रखने के लिए स्टार्टअप संस्थापक को स्वस्थ व सफल होने के लिए यह अभ्यास आवश्यक है। हर चीज़ छोड़कर सिर्फ़ न्यूनतम अनिवार्य चीज़ें करें। आसान-ही-बेहतर-है की नीति कारोबार में सर्वश्रेष्ठ परिणाम देती है।

"यह वास्तविक दुनिया में कभी काम नहीं करेगा।" जब आप लोगों को किसी नए विचार के बारे में बताते हैं, तो आप इसे हमेशा सुनते हैं। यह वास्तविक दुनिया रहने के लिए एक बहुत ही निराशाजनक जगह लगती है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ नए विचार, अपरिचित दृष्टिकोण और विदेशी अवधारणाएँ हमेशा हार जाती हैं। केवल वही चीज़ें जीतती हैं जो लोग पहले से जानते हैं और करते हैं, भले ही वे चीज़ें त्रुटिपूर्ण और अक्षम हों। सतह को खरोंचें और आप पाएंगे कि ये "वास्तविक दुनिया" के निवासी निराशावाद और हताशा से भरे हुए हैं। वे उम्मीद करते हैं कि नई अवधारणाएँ विफल हो जाएँगी। वे मानते हैं कि समाज बदलाव के लिए तैयार नहीं है या सक्षम नहीं है। इससे भी बदतर, वे दूसरों को अपनी कब्र में घसीटना चाहते हैं। यदि आप आशावादी और महत्वाकांक्षी हैं, तो वे आपको समझाने की कोशिश करेंगे कि आपके विचार असंभव हैं। वे कहेंगे कि आप अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। उन पर विश्वास न करें। वह दुनिया उनके लिए वास्तविक हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको उसमें रहना है। हम जानते हैं क्योंकि हमारी कंपनी हर तरह से वास्तविक दुनिया की परीक्षा में विफल हो जाती है। वास्तविक दुनिया में, आप दो महाद्वीपों के आठ अलग-अलग शहरों में एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारी नहीं रख सकते। वास्तविक दुनिया में, आप बिना किसी सेल्सपर्सन या विज्ञापन के लाखों ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर सकते। वास्तविक दुनिया में, आप बाकी दुनिया को अपनी सफलता का फ़ॉर्मूला नहीं बता सकते। लेकिन हमने वो सब किया है और सफल हुए हैं। वास्तविक दुनिया कोई जगह नहीं है, यह एक बहाना है। यह कोशिश न करने का औचित्य है। इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं है।

सबसे पहले आप शायद यही सवाल पूछेंगे: शुरुआती पूंजी कहां से आएगी? अक्सर लोग सोचते हैं कि इसका जवाब बाहरी लोगों से पैसे जुटाना है। अगर आप कोई फैक्ट्री या रेस्टोरेंट जैसी कोई चीज बना रहे हैं, तो आपको बाहरी नकदी की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन बहुत सी कंपनियों को महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती--खासकर आजकल। हम अब सेवा अर्थव्यवस्था में हैं। सेवा व्यवसायों (जैसे, सलाहकार, सॉफ्टवेयर कंपनियां, वेडिंग प्लानर, ग्राफिक डिजाइनर और सैकड़ों अन्य) को शुरू करने के लिए बहुत ज्यादा जरूरत नहीं होती। अगर आप ऐसा कोई व्यवसाय चला रहे हैं, तो बाहरी फंडिंग से बचें। वास्तव में, आप चाहे कोई भी व्यवसाय शुरू कर रहे हों, जितना हो सके उतना कम बाहरी नकदी लें। दूसरों का पैसा खर्च करना अच्छा लग सकता है, लेकिन इसमें एक फंदा जुड़ा हुआ है। इसका कारण यह है: आप नियंत्रण छोड़ देते हैं। जब आप फंडिंग के लिए बाहरी लोगों की ओर रुख करते हैं, तो आपको उन्हें भी जवाब देना पड़ता है। शुरुआत में यह ठीक है, जब हर कोई सहमत हो। लेकिन आगे क्या होता है? क्या आप किसी और से ऑर्डर लेने के लिए अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर रहे हैं? पैसे जुटाएँ और यही आप कर रहे हैं। "नकद निकालना" एक गुणवत्तापूर्ण व्यवसाय बनाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। निवेशक अपना पैसा वापस चाहते हैं - और जल्दी से जल्दी आमतौर पर तीन से पाँच साल। जब शामिल लोग जल्द से जल्द पैसा निकालना चाहते हैं, तो दीर्घकालिक स्थिरता खिड़की से बाहर चली जाती है। दूसरों के पैसे खर्च करना एक लत है। दूसरों के पैसे खर्च करने से आसान कुछ नहीं है। लेकिन फिर आपके पास पैसे खत्म हो जाते हैं और आपको और पैसे लेने की ज़रूरत होती है। और हर बार जब आप वापस जाते हैं, तो वे आपकी कंपनी का और पैसा ले लेते हैं। यह आमतौर पर एक बुरा सौदा होता है। जब आप अभी शुरुआत कर रहे होते हैं, तो आपके पास कोई विकल्प नहीं होता। किसी भी वित्तीय लेन-देन में प्रवेश करने के लिए यह एक भयानक समय होता है। ग्राहक टोटेम पोल से नीचे चले जाते हैं। आप ग्राहकों की बजाय निवेशकों की पसंद का निर्माण करते हैं। पैसे जुटाना अविश्वसनीय रूप से विचलित करने वाला होता है। फंडिंग की तलाश करना मुश्किल और थका देने वाला होता है। इसमें महीनों की पिच मीटिंग, कानूनी पैंतरेबाजी, अनुबंध आदि लगते हैं। यह एक बहुत बड़ा विकर्षण है जब आपको वास्तव में कुछ बढ़िया बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह इसके लायक नहीं है। हम उन व्यवसाय मालिकों से बार-बार सुनते हैं जो इस रास्ते पर चले गए हैं और पछताते हैं। वे आमतौर पर निवेश-हैंगओवर की कहानी पर अलग-अलग तरह से बात करते हैं: सबसे पहले, आपको निवेश के बारे में जल्दी ही पता चल जाता है। लेकिन फिर आप अपने निवेशकों और/या निदेशक मंडल के साथ मीटिंग करना शुरू करते हैं, और आप सोचते हैं, "अरे यार, मैंने खुद को किस मुसीबत में डाल लिया है?" अब कोई और फैसला ले रहा है। इससे पहले कि आप अपना सिर उस फंदे में डाल दें, कोई दूसरा रास्ता तलाशें।  मोटीवेशन आप को कूदने के लिये प्रेरित कर सकता है लेकिन उड़ने के लिए आदत होनी चाहिये। 21 दिन तक लगातार मोटीवेशन के कारण आप काम कर सकते है लेकिन आदत में बढ़ाने की लिए वही काम लगातार उत्साह व शृद्धा के साथ 6 माह तक करते रहने से वह आपकी आदत में बदल जाता है। स्टार्टअप सवाल क्यों पूछते हैं? मैं वैल्यू और वैल्यूएशन बनाने के लिए एक व्यवसाय शुरू करना चाहता हूं?  उत्तर हां है तो अपनी उद्यमिता की इकीगाई  को चार मापदंडों पर   क्षमता की जांच करें - पहला पागलपन ऊर्जा जुनून,  दूसरा लाभ, तीसरा समस्या-समाधान और चौथा व्यवसाय का उद्देश्य। इन मापदंडों को जांचने के लिए जमीन पर उतरें, अंतराल और दर्द बिंदुओं की खोज करें,  बेहतर समाधान दें तथा विचारों की नकल न करें जैसे फ़िल्मी दुनिया में एक ही अमिताभ बच्चन है आप न बनें। मार्केट में एक फिल्पकार्ट या ओला कंपनी है आप नक़ल न करें। नीचे से शुरू करें और ऊपर की ओर बढ़ें - अनुभव लें। 














अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय छह 


क्या सफलता की कोई समय सीमा है?


जीवन में कौन सफल नहीं होना चाहता? हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा अनुसार काम करता है और वह जो काम करता है उसमें सफल होना चाहता है। द 7 हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपल के लेखक डॉ. स्टीफन आर कॉवे  द्वारा  अनेकों अति प्रभावशाली लोगॊं के जीवन का अध्ययन कर  सात आदतें चिन्हित की है जो सफलता के लिए आवश्यक है- 

  1. सक्रिय बनिए (प्रोएक्टिव बनें) -  किसी भी परिस्थिति के नियंत्रण में रहने की बजाए हमें परिस्थितियों को नियंत्रित करना चाहिए। स्वमं निर्धारण,चुनाव  और निर्णय लेने की क्षमता ही अपकी परिस्थितियों और हालात परिस्थिति और हालात को सकारात्मक रूप में परिवर्तित कर सकती है। 

  2. अंत को ध्यान में रख कर शुरुआत करें -  कठोपनिषद में यम और नचिकेता के संवाद में यम नें  जीवन जीने के लिए  श्रेय व प्रेय मार्ग का उल्लेख किया है। श्रेय मार्ग में शुरू में कष्ट होता है लेकिन अंत सुखद होता है। प्रेय मार्ग में शुरुआत सुखद व प्रीतकर होती है लेकिन अंत कष्टपृद होता है। डॉ. स्टीफन आर कॉवे अंत को ध्यान में रख कर निर्णय लेने की इस आदत को लीडरशिप की आदत कहते है। जिस में हमारा ख़ुद पर स्वयं का नियंत्रण होना चाहिए। हमेशा लक्ष्य पर ध्यान होने से सफलता हासिल कर पाते है। 

  3. प्राथमिक चीज़ों को महत्व दें - सब के पास समय सीमित है। अतः स्वयं को प्रभावशाली बनाने के लिए स्वयं को कठोरता से अनुशासित करना आवश्यक है ताकि दिन प्रति दिन की प्रथामिकताएं पूर्ण हो सके।

  4. फायदे का सौदा विन - विन वाली सोच - हमेशा जीत के बारे में ही सोचे व प्रतिबद्ध रहे। जो दोनों तरफ़ से सन्तोषजनक व लाभकारी हो। 

  5. पहले समझने की कोशिश करें फिर समझे जाने की - किसी को सलाह, सुझाव और समाधान देने से पहले दूसरे इंसान के साथ प्रभावी तरीके से बातचीत करें ताकी हम उनका परिप्रेक्ष्य  को ध्यान से सुने और समझे।  संचार विशेषज्ञ बताते है कि बातचीत में हम 10% संवाद शब्दों से, 30% आवाज़ के उतार-चढ़ाव से, तथा 60% बॉडी लैंग्वेज से करते है। इसलिए बुद्ध व जैन धर्म में सम्यक् श्रवण पर ज़ोर दिया है। 

  6. तालमेल बिठाये - दूसरों के मूल्यों को समझने के लिए हमें  तालमेल रखना होता है जो हमें नई संभावनाएं, खुलापन और रचनात्मकता का अवसर देती है। तालमेल नए विकल्प और नई संभावनाओं का सृजन करती है। ये हमें अनुमति देते हैं कि हम पुराने तरीकों को भूल कर नए विचारों पर काम करें।

  7. नज़र को तेज करे- प्रभावी बनने के लिए हमें खुद को शारीरिक, आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक  रूप से बदलना होता है तथा जब हम खुद को निरंतर बदलने की अनुमति देते है तब जाके हम सारी आदतों को अच्छे ताल-मेल के साथ अभ्यास कर पाते हैं।

राष्ट्र कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर ने सफल व्यक्ति के लिए लिखा- 

“वसुधा का नेता कौन हुआ?

भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?

अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?

नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?

जिसने न कभी आराम किया,

विघ्नों में रहकर नाम किया।” तो सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता है।महर्षि पतंजलि कहते है कि “सफलता उनके निकटतम होती है, जिन के प्रयास तीव्र, प्रगाढ़ व सच्चे होते है। “ योग सूत्र में सफलता के चार स्तम्भ बताएँ हैं- श्रद्धा- विश्वास, वीर्य - जोश, ऊर्जा, स्मृति- याददाश्त व प्रज्ञा- जागरूकता। सफल होने के लिए लम्बी अवधि तक उत्साह व विश्वास के साथ काम करते रहना होगा। प्रयास की तीव्रता जितनी ज़्यादा  होंगी सफलता उतनी जल्दी मिलेगी। तो यह समय की लम्बाई का प्रश्न न हो कर प्रयास की गहराई का है। मन की मत सुनो, मन प्रारम्भ में विरोध करेगा। इसलिए श्रद्धा भरी निष्ठा के साथ काम करना चाहिए। बिना निष्ठा के कोई परिणाम नहीं आयेगा।  सामान्यतः प्रयास तीन तरह के होते है- मृदु, मध्य व तीव्र। तो प्रयास जिस गति का होगा फल आने में उतना समय लगेगा। तो आप शीघ्र सफल होना चाहते है तो आप को मनसा, वाचा व कर्मणा को एक लाइन में फ़ोकस रख कर कार्य करने की कोशिश करना चाहिए। क्योंकि हमारी चेतना सीमित है अतः पूर्ण फ़ोकस चाहिए। तो जिन लोगों के पास प्लान बी होता है उनकी सफलता शीघ्र नहीं आतीं। 

मल्टीटास्किंग जैसी आदतों के साथ काम करना उत्पादक नहीं हो सकता। जो व्यक्ति जिज्ञासा या कौतुहल बस काम शुरू करते है उनके प्रयास मृदु होते है। जो व्यक्ति मुमुक्षु श्रेणी के है प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों से अच्छे होते है लेकिन उनके प्रयास मध्यम श्रेणी के ही होते है। लेकिन जो पूर्ण समर्पित शिष्य श्रेणी के व्यक्ति होते है वे तीव्र प्रयास करते है। श्रम की पराकाष्ठा तक महनत करते है। ये बहुत फ़ोकस होते है लोग ऐसे व्यक्तियों को पागल समझते है। आज ऐसे अनेक स्टार्टअप के संस्थापक है जिन लोगों ने अच्छी टीम बनाई है वेनचर केपीटल से इन्वेस्टमेंट उठाये हैं और पूर्ण समर्पण से काम कर रहे है। 

जब तक आप भविष्यवक्ता नहीं हैं, तब तक दीर्घकालिक व्यवसाय योजना एक कल्पना है। ऐसे बहुत से कारक हैं जो आपके हाथ से बाहर हैं: बाजार की स्थिति, प्रतिस्पर्धी, ग्राहक, अर्थव्यवस्था, आदि। योजना लिखने से आपको लगता है कि आप उन चीज़ों पर नियंत्रण कर सकते हैं जिन्हें आप वास्तव में नियंत्रित नहीं कर सकते। क्यों न हम योजनाओं को वही कहें जो वे वास्तव में हैं: अनुमान। अपनी व्यावसायिक योजनाओं को व्यावसायिक अनुमान, अपनी वित्तीय योजनाओं को वित्तीय अनुमान और अपनी रणनीतिक योजनाओं को रणनीतिक अनुमान कहना शुरू करें। अब आप उनके बारे में ज़्यादा चिंता करना बंद कर सकते हैं। वे तनाव के लायक नहीं हैं। जब आप अनुमानों को योजनाओं में बदल देते हैं, तो आप खतरे के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। योजनाएँ अतीत को भविष्य का मार्ग दिखाने देती हैं। वे आपको अंधा बना देती हैं। "हम यहीं जा रहे हैं क्योंकि, ठीक है, हमने कहा था कि हम यहीं जा रहे हैं।" और यही समस्या है: योजनाएँ सुधार के साथ असंगत हैं। और आपको सुधार करने में सक्षम होना चाहिए। आपको आने वाले अवसरों को पहचानने में सक्षम होना चाहिए। कभी-कभी आपको यह कहने की ज़रूरत होती है, "हम एक नई दिशा में जा रहे हैं क्योंकि आज यही सही है।" लंबी दूरी की योजनाओं का समय भी गड़बड़ है। जब आप कुछ कर रहे होते हैं तो आपके पास सबसे ज़्यादा जानकारी होती है, न कि इसे करने से पहले। फिर भी आप योजना कब लिखते हैं? आमतौर पर यह तब होता है जब आप शुरू भी नहीं करते। यह कोई बड़ा फैसला लेने का सबसे खराब समय होता है। अब इसका मतलब यह नहीं है कि आपको भविष्य के बारे में नहीं सोचना चाहिए या यह नहीं सोचना चाहिए कि आप आने वाली बाधाओं से कैसे निपट सकते हैं। यह एक सार्थक अभ्यास है। बस यह न सोचें कि आपको इसे लिखने की ज़रूरत है या इसके बारे में जुनूनी होना चाहिए। अगर आप कोई बड़ी योजना लिखते हैं, तो आप शायद ही इसे कभी देखेंगे। कुछ पन्नों से ज़्यादा लंबी योजनाएँ आपकी फ़ाइल कैबिनेट में जीवाश्म बनकर रह जाती हैं। अनुमान लगाना छोड़ दें। तय करें कि आप इस हफ़्ते क्या करने जा रहे हैं, इस साल नहीं। अगली सबसे महत्वपूर्ण चीज़ का पता लगाएँ और उसे करें। कुछ करने से ठीक पहले निर्णय लें, बहुत पहले नहीं। बिना सोचे समझे निर्णय लेना ठीक है। बस विमान में चढ़ें और चले जाएँ। वहाँ पहुँचने के बाद आप एक अच्छी शर्ट, शेविंग क्रीम और टूथब्रश खरीद सकते हैं। बिना योजना के काम करना डरावना लग सकता है। लेकिन बिना किसी योजना का आँख मूंदकर पालन करना जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है, उससे भी ज़्यादा डरावना है।

एक और बात जो आप अक्सर सुनते हैं: "आपकी बाहर निकलने की रणनीति क्या है?" आप इसे तब भी सुनते हैं जब आप अभी शुरुआत कर रहे होते हैं। ऐसे लोगों के साथ क्या होता है जो बिना यह जाने कि वे इसे कैसे छोड़ेंगे, कुछ बनाना भी शुरू नहीं कर सकते? जल्दी क्या है? अगर आप इसमें उतरने से पहले ही बाहर निकलने के बारे में सोच रहे हैं तो आपकी प्राथमिकताएँ गड़बड़ा गई हैं। क्या आप ब्रेकअप की योजना बनाते हुए किसी रिश्ते में प्रवेश करेंगे? क्या आप पहली डेट पर प्रीनअप लिखेंगे? क्या आप अपनी शादी की सुबह तलाक के वकील से मिलेंगे? यह हास्यास्पद होगा, है न? आपको प्रतिबद्धता की रणनीति की जरूरत है, बाहर निकलने की रणनीति की नहीं। आपको इस बारे में सोचना चाहिए कि आप अपने प्रोजेक्ट को कैसे आगे बढ़ाएँ और सफल बनाएँ, न कि आप कैसे जहाज से कूदने जा रहे हैं। अगर आपकी पूरी रणनीति छोड़ने पर आधारित है, तो संभावना है कि आप पहले स्थान पर बहुत आगे नहीं बढ़ पाएँगे। आपने बहुत से महत्वाकांक्षी व्यवसायियों को अपनी उम्मीदें बेचने पर टिके हुए देखा होगा। लेकिन अधिग्रहण की संभावना बहुत कम है। इस बात की बहुत कम संभावना है कि कोई बड़ा दावेदार आपके पास आए और यह सब सार्थक बना दे। शायद 1,000 में से 1? या 10,000 में से 1? साथ ही, जब आप अधिग्रहित होने के इरादे से कोई कंपनी बनाते हैं, तो आप गलत चीजों पर जोर देते हैं। ग्राहकों को आपसे प्यार करवाने पर ध्यान देने के बजाय, आप इस बात की चिंता करते हैं कि आपको कौन खरीदेगा। इस पर ध्यान देना गलत है। और मान लीजिए कि आप इस सलाह को अनदेखा करते हैं और एक फ्लिप करते हैं। आप अपना व्यवसाय बनाते हैं, इसे बेचते हैं, और एक अच्छा वेतन प्राप्त करते हैं। फिर क्या? एक द्वीप पर चले जाते हैं और पूरे दिन पिना कोलाडा पीते हैं? क्या यह वास्तव में आपको संतुष्ट करेगा? क्या केवल पैसा ही आपको वास्तव में खुश कर देगा? क्या आपको यकीन है कि आप उस व्यवसाय को चलाने से ज़्यादा इसे पसंद करेंगे जिसका आप वास्तव में आनंद लेते हैं और जिस पर आप विश्वास करते हैं? यही कारण है कि आप अक्सर ऐसे व्यवसाय मालिकों के बारे में सुनते हैं जो बेच देते हैं, छह महीने के लिए रिटायर हो जाते हैं, और फिर वापस खेल में आ जाते हैं। वे उस चीज़ को याद करते हैं जो उन्होंने दी थी। और

आमतौर पर, वे एक ऐसे व्यवसाय के साथ वापस आते हैं जो उनके पहले व्यवसाय जितना अच्छा नहीं होता।

ऐसा मत बनो। अगर आप कोई अच्छी चीज़ शुरू करने में कामयाब हो जाते हैं, तो उसे जारी रखो। अच्छी चीज़ें अक्सर नहीं मिलतीं। अपने व्यवसाय को ऐसा मत बनने दो जो हाथ से निकल गया।









अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  सात


सफलता में बाधाएँ 


जब कोई इंटरप्रेन्योर स्टार्टअप शुरू करता है तो प्रारंभ में स्टार्टअप पूर्ण रूप से संस्थापक पर ही निर्भर करता है। लक्ष्य अभी बहुत दूर है और रास्ता लम्बा है। शुरू में संसाधन बहुत सीमित होते है और समस्याओं का अम्बार होता है। टीम नहीं होने से संस्थापक हमेशा अकेलापन महसूस करता है। इसलिए संस्थापक की स्थिति का प्रभाव संस्था पर बहुत अधिक होता है। महर्षि पतंजलि ने सफलता बाधाओं को चिन्हित किया है - 

  1. व्याधि- इंटरप्रेन्योर कई वार “वर्क लाईफ़ बैलेंस” न कर पाने से उनकी शरीर की ऊर्जा की प्राकृतिक लय बिगड़ जाती है तब वे बीमार हो जाते है। अपने मनोभावों व भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाने के कारण इसका प्रभाव काम पर पड़ता है। “वर्क लाईफ़ बैलेंस” पर इन्फ़ोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति ने हाल ही में प्रति सप्ताह 70 घन्टा काम करने की बहस पर बोलते हुए कहा कि वे “वर्क लाईफ़ बैलेंस” में विश्वास नहीं करते है और इस देश में हमें कड़ी मेहनत करने की ज़रूरत है। हार्ड वर्क का कोई विकल्प नहीं है। सोशल मीडिया पर यह बहस बहुत मज़ेदार हो गई है। जो लोग संस्थापक है वे श्री मूर्ति का समर्थन कर रहे है और जो कर्मचारी है वे पाँच दिन के सप्ताह की वकालत कर रहे है। लेकिन श्री गौतम अड़ानी व श्री आनंद महेंद्रा जैसे कुछ लोगों का कहना है कि “वर्क लाईफ़ बैलेंस” बहुत व्यक्तिपरक विषय है इसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। यदि किसी को उनके किसी काम में आनंद आता है तो “वर्क लाईफ़ बैलेंस” है। संतुलन व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर निर्भर है। प्रश्न समय का नहीं है बल्कि व्यक्ति की उत्पादकता का है। जोनाथन फ़ील्ड ने उपने एक लिंकडिन पोस्ट में लिखा कि उनके एक स्पार्क पाँडकास्ट में स्नैप चैट के संस्थापक बेंजमिन से बात की, जो मानसिक स्वास्थ्य पर उद्यमिता के प्रभाव को उजागर करने के मिशन पर है, उन्होंने स्टार्टअप के संस्थापकों का डिजीटल सर्वे कर निष्कर्ष निकाले है कि 72% संस्थापक मानसिक स्वास्थ्य से जूझते है, 54% अपने बिज़नेस को लेकर बहुत तनाव में रहते है, 37% चिन्ता से पीड़ित है, 36% वर्नआउट का अनुभव करते हैं तथा 10% को पैनिक अटैक आते है। इन सब में सबसे भयानक बात यह है कि 81% संस्थापक अपने तनाव, भय और चुनौतियों को दूसरों से छिपाते हैं और आधे से अधिक अपने सह संस्थापकों से भी छुपाते है। लगभग 77% संस्थापक पेशेवर मदद लेने से इनकार करते है। युवा संस्थापक प्रौढ़ संस्थापकों की तुलना में मदद लेने को कलंक मानते हैं तथा महिला संस्थापकों की तुलना में पुरुष संस्थापक दोगुनी मात्रा में कलंक मानते हैं। 50% से अधिक संस्थापक कम्पनी की स्थापना के साथ नींद खो देते हैं तथा फ़ंडिंग के अनुपात में यह बीमारी बड़ती जाती है। 47% से अधिक संस्थापक कम्पनी की स्थापना के साथ कम व्यायाम करते है, अपने जीवन साथी के साथ 60% कम समय बिताते हैं। 58% अपने बच्चों के साथ कम समय बिताते हैं। 73% कम समय दोस्तों व परिवार के सदस्यों के साथ बिताते हैं और अकेलेपन की भावना 10 में से 8 संस्थापकों में रहतीं है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इतने सारे दुखों के बावजूद 93% संस्थापक फिर से यह सब शुरू करना चाहते है। इसलिए सफल होने के लिए संस्थापक का स्वस्थ रहना आवश्यक है। 

  2. स्त्यान - धैय की कमी संकेत है कि इंटरप्रेन्योर की ऊर्जा बहुत निम्न तल पर है। महर्षि पतंजलि के समय “प्राण ऊर्जा” के सिद्धांत का जन्म हुआ। प्राण ऊर्जा या देह ऊर्जा मानव  शरीर में निरंतर घूमती रहती है। शरीर की ऊर्जा में गड़बड़ी होने पर धैर्य की कमी हो जाती है। इंटरप्रेन्योर बेचेन रहता है। इसलिए इंटरप्रेन्योर  की ऊर्जा हमेशा उच्च रहनीं चाहिए तभी वह संतुलित कोच विचार कर निर्णय ले सकता है, टीम को प्रोत्साहित कर सकता है तथा दैनिक समस्याओं का हल निकाल सकता है। निर्जीवता या निम्न ऊर्जा के कारण इंटरप्रेन्योर हमेशा केवल बड़ी बड़ी बातें भर करता है और कुछ करके नहीं दिखा पाता। निर्धारित लक्ष्यों से पिछड़ जाने के कारण नकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित करता है। ऐसे व्यक्ति ध्यान कर अपनी ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदल सकते है। 

  3. संशय - अनिर्णय की स्थिति में इंटरप्रेन्योर  अपने स्टार्टअप के विरूद्ध संदिग्ध हो जाता है। अपने भरोसे व आस्था पर शंका होने पर सफलता पर प्रभाव पड़ता है। श्री कृष्ण ने गीता में कहा है- ‘अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: ||’ किन्तु जो अज्ञानी तथा श्रद्धाविहीन व्यक्ति शास्त्रों में संदेह करते हैं, वे भगवद्भावनामृत नहीं प्राप्त करते, अपितु नीचे गिर जाते है | संशयात्मा के लिए न तो इस लोक में, न ही परलोक में कोई सुख है | ऐसे इंटरप्रेन्योर निश्चिय युक्त नहीं होते है। यह करना है या नहीं निर्णय न कर पाने के कारण विश्लेषण पक्षाघात “एनालिसिस पेरालिसिस” का शिकार हो जाते है। समय पर निर्णय न होने के कारण यह लाख से चूक जाते है। इंटरप्रेन्योर को स्टार्टअप शुरू कर लेने के बाद संशय को सहयोग नहीं करना चाहिए। जब इंटरप्रेन्योर  संशय को सहयोग करता है तो वह अपनी चेतना की ऊर्जा देने लगता है तो अनिश्चितता बहुत बिगड़ती जाती है। तो यदि वह निर्णय नहीं ले पा रहा है तो वह काम कैसे कर सकता है। मनोवैज्ञानिक बैरी श्वार्टज़ ने अपनी किताब ‘द पैराडॉक्स ऑफ़ चॉइस: व्हाई मोरे इस लेस्स’ में लिखा है कि जब लोगों को अधिक विकल्प दिए जाने पर कभी-कभी वे कुछ भी नहीं चुना पाते है। इस अवस्था से बाहर आने के लिए बड़े लक्ष्यों को छोटे छोटे लक्ष्यों में विभाजित करना, कामों की प्राथमिकता सूची बनाना, टीम के सदस्यों की राय लेना चाहिए। अपनी सहज प्रतिक्रिया गट फ़ीलिंग को अति महत्व न देना तथा यह मान कर चलना कि कोई सर्वोत्तम निर्णय नहीं होता, केवल सीखने के अवसर होते है। संशय कुत्ते की भाँति पीछे आता ही है यदि हम ध्यान न दें तो समाप्त हो जाता है। 

  4. प्रमाद - असावधानी की अवस्था नींद में चलने जैसी होती है। इंटरप्रेन्योर अनेक वार अपने विचार से सम्मोहन ग्रस्त हो जाने पर सचेत नहीं रह पाता है। जैसे आज कल स्टार्टअप का टीवी, रेडियो, अख़बार, फ़िल्म व सोशल मीडिया पर इतना रोमांटिक तरीक़े से प्रचारित किया जा रहा है कि रह कोई स्टार्टअप शुरू कर इंटरप्रेन्योर बनना चाहता है। ताकि वह अपनी प्रोफ़ाइल में सह संस्थापक या सीईओ लिख सके। यदि तुम इस सबसे सम्मोहित हो कर इंटरप्रेन्योर बन रहे हो तो हो सकता है कि तुम अपनी पड़ाई या कैरियर चौपट कर सकते हो। इसलिए आजकल हर 10 में से 9 स्टार्टअप तीन साल के अंदर बंद हो जाते है। यदि सम्मोहनवश स्टार्टअप शुरू कर दिया तो कुछ दिन बाद दिन प्रतिदिन की चुनौतियों के कारण काम करने में मन नहीं लगता है। क्योंकि कुछ भी करने का तुक समझ में नहीं आता है। यदि तुम लगे भी रहते हो तो कुछ प्राप्ति नहीं होती है। हृदय में आलस्य बैठ जाता है। आलस्य का अर्थ है कि तुमने जीवन के प्रति उत्साह खो दिया है। इंटरप्रेन्योर की उत्सुकता, ऊर्जा व उत्साह बच्चों जैसी होना चाहिए। लेकिन इंटरप्रेन्योर के मन में बहुत सारे नकार, असफलताओं और हताशाओं की परतें जम जाने से प्रमाद बढ़ जाता है। जो असफलता को लाता है। 

  5. अविरति - विषयासक्ति इंटरप्रेन्योर में एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में सामने आती है। इंटरप्रेन्योरस् अनेक बार कई कारणों से फ़र्ज़ी अकाउंट बनाते है। फ़र्ज़ी ग्रोथ दिखाते हैं। अपनी जीवनशैली बहुत लक्ज़री व आलीशान बनाने के लिए अनाप-शनाप खर्च करते है। फण्ड की हेराफेरी करते है। सहकर्मियों से ग़ैरक़ानूनी सम्बन्ध बनाते है और न जाने कितनी तरह की व्यभिचार की कहानियाँ आये दिन मीडिया में रहतीं है। गूगल को-फाउंडर की पत्नी निकोल शनाहन की कहानी, जिसके मस्क से अफेयर की ख़बरें, गंभीर व्यक्तिगत दुर्व्यवहार के आरोपों में घिरने के बाद सीईओ के पद से इस्तीफा देने वाले फ्लिपकार्ट के सीईओ बिन्नी बंसल का विवाद, अशनीर ग्रोवर भारतपे के को-फाउंडर के बीच का विवाद,  हाउसिंग डॉट कॉम के सह-संस्थापक और सीईओ राहुल यादव को बोर्ड आफ डायरेक्टरों द्वारा निकाले जाने का मामला, चर्चित मामले है। वीवर्क का चाहे जो भी हस्र हुआ हो पर कंपनी पूर्व सीईओ और सह-संस्थापक एडम न्यूमैन की सम्पत्ति बड़ती रही। उबर में यौन उत्पीड़न समेत अन्य विवादों के जोर पकड़ने के बाद सह संस्थापक कलानिक को जून, 2017 में कंपनी के मुख्य कार्यकारी का पद छोड़ना पड़ा था। एडटेक प्लेटफॉर्म बायजू की वर्थ जीरो होने की बात कंपनी के फाउंडर बायजू रवींद्रन ने मानने की कहानी के बाद स्टार्टअप जगत में कारपोरेट गवर्ननेन्स से सरकारें व इन्वेस्टर भी परेशान हैं। अविरति के कारण स्टार्टअप संस्थापक अपना, कम्पनी के कर्मचारियों व कम्पनी का भविष्य संकट में डाल देते है।

  6. भ्रांतिदर्शन -मिथ्या ज्ञान के कारण कंपनी के फाउंडर अपने बिज़नेस आइडिया, रणनीति, व बाज़ार के बारे में भ्रम पाल लेते है। भ्रम का अर्थ है खुलीं आँख का सपना। कंपनी के फाउंडर के इन भ्रमों के कारण अनेकों स्टार्टअप को अपूरणीय क्षति हुई है। अतः कंपनी के फाउंडर को भ्रांतिदर्शन से बचने की कोशिश करना चाहिए। विलवर्ग लेब पर फ़िल सेंटोरो ने 150 स्टार्टअप संस्थापकों से सर्वे के अनुसार निष्कर्ष निकाला कि 64% टेक संस्थापकों ने बताया कि उनकी कंपनी को संभावित व्यावसायिक विफलता का सामना करना पड़ा था। औसतन, टेक कंपनियों को व्यवसाय में लगभग 17 महीने बाद अपनी संभावित विफलता का सामना करना पड़ा। संभावित व्यावसायिक विफलताओं का सामना करने वाले 75% संस्थापकों ने स्वीकार किया कि उनकी कंपनी व्यवसाय में बने रहने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थी।

  7. अपलब्धभूमितत्व - लक्ष्य से भटक जाना स्टार्टअप के संस्थापक के स्वभाव में आ जाता है। प्रतिदिन उसे नये नये आइडिया आते रहते हैं तथा बाज़ार में काम करने की सम्भावनाओं के कारण वह अपने लक्ष्य से भटक जाता है। टीम अपने लीडर का अनुसरण करती है व लक्ष्य से भटके लीडर की टीम भी भटक जाती हैं। इसलिए स्टार्टअप में हमेशा प्रोडक्ट मार्केट फ़िट की अवधारणा पर ज़ोर देते है। 

  8.  अनवस्थिततत्वानि - प्रकृति को बनाए रखने की अक्षमता की स्थिति तब आती है जब स्टार्टअप संस्थापक अपनी इंटरप्रेन्योर की भावना को बचाय रखने में सक्षम नहीं रह जाता है। इंटरप्रेन्योर की भावना नई सोच, नई समस्या का नया समाधान ढूँढने की होती है। जो दूसरे के लिए समस्या होती है वह इंटरप्रेन्योर के लिए बिज़नेस ओप्पोरचोनिटी होतीं है। लेकिन जब वह अनवस्थिततत्वानि की अवस्था में आ जाता है तब वह यह मनोदशा बनाएँ रखने में विफल होने पर अपने स्टार्टअप की सफलता से दूर हो जाता है। 

  9. चित्तविक्षेप- चेतना में भटकाव उत्पन्न करने में रोग, उदासीनता, अनिर्णय, उपेक्षा, आलस्य, अपने स्वार्थ पर नियंत्रण न रख पाना, भ्रम में देखना व प्राप्त उपलब्धियों को सहेज न पाने की अक्षमता व प्राप्त प्रगति को बनाए रखने की विफलता के कारण चित्त में विक्षोभ बड़ जाते है जो सफलता को पाने की मुख्य रूकावटें हो जाती है। 

इसलिए स्टार्टअप के संस्थापक को इन की स्थिति को समझ कर निरंतर नियंत्रण की आवश्यकता होती है। 


 














अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  आठ


आपसी संव्यवहार के आधार 


आज सोशल मीडिया, मोबाइल फ़ोन व इन्सटेंट मेसेज प्लेटफ़ॉर्म की वजह से आपसी संवाद बहुत तीव्र गति से करना सम्भव हो गया है। लेकिन टेक्नोलॉजी के जहॉ फ़ायदे हैं बहीं नुक़सान भी है। आज कल लोगों में धैर्य की कमी हो गई है। लोग जजमेन्टल हो गये है बिना सोचे समझे सोशल मीडिया पर मेसेज फ़ॉरवर्ड करते है और लाईक डिसलाईक करते है। स्टार्टअप की दुनिया में प्रतिस्पर्धाओं का दौर चलता रहता है। मार्केट पर क़ब्ज़ा करने के लिए बहुत अफ़वाहों को फैलाया जा रहा है। 

इंटरप्रेन्योर को निरंतर अपनी टीम बनाने की ज़रूरत होती है। जैसे जैसे टीम बड़ती है वैसे वैसे आपसी विवाद भी बड़ते है। अधिकांश स्टार्टअप को फ़ाउन्डरों के साथ शुरू होते है ऐसे में जैसे जैसे कम्पनी में फ़ंडिंग आतीं है वैसे वैसे को फ़ाउन्डरों के मध्य पद नाम, शेयर होल्डिंग्स, पावर व पर्कस को लेकर विवाद होने लगते है और जब कम्पनी में पैसे का नुक़सान होता है तो एक दूसरे पर दोषारोपण करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। 

यह स्वस्थ संवाद के लिए बहुत घातक हो सकता है। बिज़नेस के लिए को फ़ाउन्डरों के अलावा पार्टनरशिप भी अलग-अलग लोगों के साथ की जाती है। ऐसे में पार्टनरों के साथ बातचीत बहुत महत्वपूर्ण होती है। स्टार्टअप की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि हम स्पष्ट बातचीत करें, रोल्स व रिस्पांसिबिलिटीस का स्पष्ट विभाजन हों तथा पार्टनरशिप डीडस बहुत डीटेल व विधि अनुसार बनाना चाहिए। लेकिन इस सब पूर्व सावधानियों के बावजूद हम हमेशा इतने सौभाग्यशाली नहीं होते है कि सब कुछ निर्वाध गति से चले। स्टार्टअप की सफलता में सह संस्थापकों  की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 

द फाउंडरस डायलेमा संस्थापक की दुविधाएँ: स्टार्टअप को डुबो सकने वाले नुकसानों का पूर्वानुमान लगाना और उनसे बचना में किताब के लेखक नोम वासरमैन ने लिखा है कि अक्सर एक नया व्यवसाय शुरू करने के उत्साह में उद्यमियों के सामने आने वाले सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक को कम महत्व दिया जाता है: क्या उन्हें अकेले आगे बढ़ना चाहिए, या व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए सह-संस्थापकों, कर्मचारियों और निवेशकों को लाना चाहिए? सिर्फ़ वित्तीय पुरस्कारों से ज़्यादा कुछ दांव पर लगा होता है। दोस्ती और रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। एक आशाजनक उद्यम की शुरुआत में गलत निर्णय इसके अंतिम विनाश की नींव रखते हैं। 

द फाउंडर्स डिलेमास पहली किताब है जो उद्यमियों द्वारा शुरुआती निर्णयों की जांच करती है जो एक स्टार्टअप और उसकी टीम को बना या बिगाड़ सकते हैं।

एक दशक के शोध के आधार पर, नोम वासरमैन ने संस्थापकों के सामने आने वाली आम गलतियों और उनसे बचने के तरीकों के बारे में बताया। वह इस बात पर विचार करते हैं कि दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ मिलकर सह-संस्थापक बनना एक अच्छा विचार है या नहीं, संस्थापक टीम के भीतर इक्विटी को कैसे और कब विभाजित किया जाए, और कैसे पहचाना जाए कि एक सफल संस्थापक-सीईओ को कब बाहर निकल जाना चाहिए या निकाल दिया जाना चाहिए। वासरमैन बताते हैं कि कैसे विनाशकारी गलतियों का पूर्वानुमान लगाया जाए, उनसे बचा जाए या उनसे उबरा जाए जो संस्थापक टीम को विभाजित कर सकती हैं, संस्थापकों से नियंत्रण छीन सकती हैं और संस्थापकों को उनकी कड़ी मेहनत और अभिनव विचारों के लिए वित्तीय भुगतान के बिना छोड़ सकती हैं। वह स्टार्टअप को नियंत्रित करने और इसे विकसित करने के लिए सर्वोत्तम संसाधनों को आकर्षित करने के बीच प्रत्येक चरण में सावधानीपूर्वक संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं, और प्रदर्शित करते हैं कि क्यों आसान अल्पकालिक विकल्प अक्सर दीर्घकालिक में सबसे खतरनाक होते हैं।

संस्थापक की दुविधाएँ ट्विटर के इवान विलियम्स और पेंडोरा के टिम वेस्टरग्रेन जैसे संस्थापकों की अंदरूनी कहानियों पर आधारित हैं, जबकि लगभग दस हज़ार संस्थापकों पर मात्रात्मक डेटा का विश्लेषण करती हैं। लोगों की समस्याएँ स्टार्टअप में विफलता का प्रमुख कारण हैं। तो आपसी संव्यवहार आपके बिज़नेस को सफल एवं असफल बनाने की ताक़त रखता है। ऐसा नहीं है कि यह समस्या आज की है। यह समस्या मानव समाज में शुरू से विद्यमान रहीं है। मेरी समझ से महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में इस बात का समाधान प्रस्तुत किया कि हमें किस अवस्था के व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का मनुष्य से व्यवहार मैकेनिकल न हो कर  बायोलॉजीकल होता है जो देश, काल व परिस्थिति में निरंतर बदलता रहता है। इसलिए महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र के 33 वें श्लोक में लिखा- “ मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।।”

महर्षि पतंजलि ने लोगों को चार वर्गों में विभाजित किया है तथा उनके साथ कैसा व्यवहार करना है- आनंदित व्यक्ति के प्रति मैत्री, दुखी व्यक्ति के प्रति करूणा, पुण्यवान के प्रति मुदिता तथा पापी के प्रति उपेक्षा का भाव रखना चाहिए। ओशो रजनीश योग सूत्र की व्याख्या में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते है कि पहले हमें अपनी स्वाभाविक मनोवृत्ति के समझना होगा। 

जब तुम किसी को प्रसन्न देखते हो, तो तुम ईर्ष्या अनुभव करते हो। दुखी अनुभव करते हो। यह स्वाभाविक है और महर्षि पतंजलि कहते है कि प्रसन्न के प्रति मैत्री भाव रखो। यह सरल नहीं है। हो सकता है कि यदि कोई हमारे क्षेत्र का स्टार्टअप सफलता से मुदित आनंदित हो और हम प्रसन्नता दिखाएं तो यह एक ऊपरी बात होगी। यह एक दिखावा या मुखौटा ही होता है। हम अपने अन्दर तो ईर्षा ही अनुभव करते है क्योंकि वह हमारा प्रतिद्वंद्वी है। 

हम बाज़ार में उससे प्रतिस्पर्धा कर रहे है। हो सकता है कि उसके पास हम से ज़्यादा संसाधन हो, ज़्यादा बाज़ार का हिस्सा हो, वह ज़्यादा सस्ता सप्लाई कर रहा हो और वह हमारे बिज़नेस को भविष्य में संकट में डल सकता हो तो ऐसी स्थिति में हमसे उस के प्रति ईर्ष्या का व्यवहार ही होगा। लेकिन यहाँ हमें समझना होगा कि प्रसन्नता धरती पर असीमित मात्रा में है। तो यह हमारा चुनाव हैं। ओशो कहते है कि यदि तुम दूसरे की प्रसन्नता में प्रसन्नता अनुभव करो तो तुम स्वयं की प्रसन्नता के लिए एक द्वार खोलते हो। 

दूसरे महर्षि पतंजलि कहते है कि दुखी के प्रति करूणा का भाव रखना। यहाँ समझने की बात है सहानुभूति करूणा नहीं है। जब कोई स्टार्टअप असफल हो रहा है तो हम सामान्यतः सहानुभूति प्रकट करते है लेकिन अगर हम गहरे में देखे तो सहानुभूति प्रकट करते समय हम अंदर प्रसन्नता का अनुभव करते है। लेकिन जब हम करूणावश  उसकी सहायता करते है तो इस अवस्था में हम न प्रसन्नता या दुख का अनुभव नहीं करते है तो करुणावान होना बिल्कुल अलग बात है तब सामने बाला भी हर्ट् फ़ील नहीं करता है। 

तीसरी बात है पुणयवान के प्रति मुदिता का व्यवहार करना। जब कोई स्टार्टअप सफल होता है तो हम तुरंत उसकी आलोचना करने लगते है। बुराइयों को खोजने लगते है। और किसी न किसी तरह नीचे लाना चाहते है। क्योंकि हम किसी अन्य को पुण्यात्मा नहीं मान सकते। इससे हमारे अहंकार को चोट लगती है। 

तो यदि हम यह मानने को तैयार नहीं है कि कोई भला है, नेक है, हमसे अच्छी तरह बिज़नेस कर रहा है तो हम प्रसन्नता पूर्वक कैसे व्यवहार कर सकते है। लेकिन यदि किसी स्टार्टअप की सोशल मीडिया पर निंदा चल रही है तो हम सबूत नहीं माँगते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि वे बुरे है। सकारात्मक के लिए सबूत की ज़रूरत होती है लेकिन नकारात्मक के लिए किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होती। यह व्यवहार हम नेट पर सोशल मीडिया पर रोज़ देखते हैं। क्योंकि इससे हमारा अहंकार पोषित होता है। तो महर्षि पतंजलि कहते है कि पुण्यवान के प्रति मुदिता के भाव से व्यवहार करना अभी हमारे लिए स्वभाविक नहीं है लेकिन यदि हम अभ्यास करें तो अपना ही भला करेंगे। सफल लोगों से हमारी नेटवर्किंग अच्छी हो सकती है जिससे हमें हमारे बिज़नेस की सफलता में मदद मिलेगी। 

चौथी बात महर्षि पतंजलि कहते है कि बुरे के प्रति उपेक्षा का भाव रखना। निंदा मत करना, बुराई नहीं फैलाना। यदि हम बुरे की निंदा करते है तो धीरे-धीरे हम उसी तल पर पहुँच जाते है। हम ग़लत के साथ आसानी से अशक्त हो जाते है। मनोवैज्ञानिक नियम यह है कि हम जिस किसी चीज़ पर ज़्यादा ध्यान देते है तो हम उससे सम्मोहित हो जाते है। यह एक आकर्षण बन जाता है। महर्षि पतंजलि आंतरिक मन के तंत्र को जान कर ही कहते है कि पापी के प्रति उपेक्षा का भाव रखना। 

बाहर से तुम क्या हो इसका ज़्यादा मूल्य नहीं है सवाल है कि हमारे आंतरिक सम्मोहन कैसे है वहीं हमारे जीवन के क्रम को निर्धारित करता है। तो बुराई के प्रति तटस्थ रहना, उपेक्षा का अर्थ भावशून्यता नहीं है, इसका इतना ही अर्थ है कि तुम मूल्यांकन न करो। ओशो कहते है कि जीवन इतना संश्लिष्ट है कि बुराई अच्छाई बन जाती है। ये परिवर्तनशील है। यदि सोशल मीडिया पर किसी स्टार्टअप की गड़बड़ी की कोई बहस चल रही है तो हमें अनावश्यक रूप से उसमें भाग नहीं लेना चाहिए। महर्षि पतंजलि की व्यवहार की यह सलाह मानने से बिज़नेस की सफलता के साथ साथ हमारे निजी सम्बन्ध भी मज़बूत होकर सफलता में योगदान देंगे। 





अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  नौ 


दुख के कारण 


स्टार्टअप की यात्रा रहस्यमय यात्रा होती है। इस यात्रा में सफलता अनायास नहीं मिलती बल्कि अर्जित करना होतीं है। इंटरप्रेन्योर को मेहनत करनी पड़ती है तथा बहुत सारे लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। जिससे प्रतिदिन तरह-तरह के विवाद होते रहते है। यदि सह संस्थापकों में क्लेश हैं तो सब दुःखी रहते हैं। दुःख एक नकारात्मक भाव की अवस्था है। दुःख अंधकार की तरह है यह कोई अस्तित्वगत बात नहीं है। और यदि सह संस्थापकों के मध्य दुःखों से लड़ना शुरू कर देते है तो और दुःख निर्मित कर लेते है। तो यहाँ बात है हमारे चयन की हम नकारात्मक प्रतिक्रिया चुनते हैं या सकारात्मक। जो इंटरप्रेन्योर नकारात्मक प्रतिक्रिया चुनते हैं वे आपस में लड़ने लगते है एक दूसरे पर दोषारोपण करने लगते है तो वहीं दूसरी ओर सकारात्मक इंटरप्रेन्योर दुःख के कारणों की खोज कर उन कारणों को दूर करने की कोशिश करता है। 

स्टार्टअप शुरू करना इंटरप्रेन्योर के लिए बड़े साहस का काम होता है। अधिकांश लोग स्टार्टअप शुरू करने के मार्ग पर आते ही नहीं है, केवल कुछ लोग शुरू करने की सोचते हैं और सोचते ही रहते है व अवसर खो देते है, केवल विरले लोग शुरू कर पाते है और उन विरले लोगों में केवल चंद्र लोग सफल हो पाते है। तो अधिकांश लोगों को जीवन जो अवसर देता है वे उससे चूक जाते है। इंटरप्रेन्योर का जीवन सर्वाधिक असुरक्षित जीवन है इसमें सुरक्षा का कोई बीमा नहीं होता। ऐसे में अधिकांश लोग जीवन में सुरक्षा चुनने के कारण अपना कारोबार शुरू नहीं कर पाते। लेकिन वे जो भी काम चुनते हैं वहाँ भी दुखी ही रहते हैं और हमेशा अपनी परिस्थितियों के लिए दूसरों को दोष देते रहते हैं। जीवन का एक सिद्धांत है कि जो जितना जोखिम उठायेंगे उनके सफल होने के अवसर उतने अधिक होते है। उनकी अपनी कहानियाँ होतीं है वे अपने लिए एक संतुष्टि का जीवन जीने के साथ अन्य लोगों के लिए अवसर व आधार तैयार करते है। 

हर महिला व पुरुष के गहरे तलों पर ख़तरों के बीच जीने की अंतःप्रेरणा होती है। इसलिए प्रेरणा के वशीभूत हो कर लोग दूसरे के व्यवसाय में शेयर ख़रीदते हैं और जोखिम उठाते है। आज भारत में 11 करोड़ से ज़्यादा लोग शेयर बाज़ार में निवेश करते है। इनमें से अधिकांश लोग बार-बार नुक़सान उठाने के बावजूद बार बार निवेश करते है। इसलिए महर्षि पतंजलि कहते है कि “विवेक पूर्ण व्यक्ति जानता है कि हर चीज दुःख की ओर ले जाती है।” बुद्ध द्वारा प्रतिपादित चार आर्य सत्यों में पहल सत्य है कि जीवन दुख है। इसलिए स्टार्टअप के संस्थापक के जीवन का एक मात्र आधार है आशा। इसलिए इंटरप्रेन्योर सफल होने की आशा के सहारे सारे दुख सह जाता है। 

चीन के इंटरप्रेन्योर जैक मॉ कहते है कि “ कभी हार मत मानो, आज कठिन है, कल और भी कठिन होगा लेकिन परसों सुन्दर होगा।” यथार्थ हमेशा कठोर होता है लेकिन भविष्य हमेशा सुन्दर होता है। दुख का कारण जानने के लिए उसका सामना करना होता है। यदि हम उससे बच कर निकल भागते हो तो हम कभी भी उन कारणों को नहीं जान सकते और कभी-कभी दुख की कल्पना उसका सामना करने से भयंकर होती है। आशा का तंत्र एक नशे की तरह काम करता है। इंटरप्रेन्योर की यात्रा में दुख एक राजमार्ग जैसा है, इंटरप्रेन्योर कहीं से भी यात्रा शुरू करें दुख आ ही जातें है। इंटरप्रेन्योर इससे बच नहीं सकता। तो यदि इंटरप्रेन्योर दुख का साक्षात्कार करता है तो वह पाता है कि वास्तव में वह इतना बड़ा भी नहीं है जितने की कल्पना की गई थी। 

समाज में दो तरह के लोग है एक वे जो समय ख़रीदते हैं और दूसरे वे जो समय बेचते हैं। तो इंटरप्रेन्योर समय ख़रीदने बाला है और नौकरी करने बाला समय बेचने बाला। तो क्या समय बेचने बाला दुखी नहीं है, बल्कि वह ज़्यादा दुखी है। तो इंटरप्रेन्योर को बदलना होता है। इस बात की परीक्षा तब होती है जब कठिन समय होता है, क्योंकि अच्छे समय में सभी बहादुर होते है। 

कठिन समय में ही सह संस्थापकों के बीच रिश्ते, भूमिकाएँ और पैसे से जुड़े संघर्ष, निवेशकों का रणनीति में हस्तक्षेप आदि की परीक्षा होती है। इन संघर्षों पर की बिज़नेस की सफलता या असफलता निर्भर करती है। यह बिज़नेस के जीवन चक्र को प्रभावित करता है। रिश्ते नष्ट हो जाते है, आर्थिक हानि होती है। हालाँकि मीडिया में स्टार्टअप के इस श्याह पक्ष को  कम करके दिखाया जाता है। केवल उजले पक्ष को उत्सव मनाया जाता है। तो इंटरप्रेन्योर का बिज़नेस रोमांटिक लव स्टोरी जैसा न होकर शादीशुदा पति पत्नी के जीवन से भी जटिल होता है क्योंकि इंटरप्रेन्योर अपने जीवन साथी से ज़्यादा अपना समय स्टार्टअप में बिताते हैं। सबसे अच्छी टीम तब बनतीं है जब लोग एक दूसरे के कौशल कमियों के पूरक होते है। उनमें मत भेद हो सकते है लेकिन मन भेद नहीं होते है। 

हमारी संस्कृति में काम के प्रति जुनूनी लोगों का सम्मान किया जाता है। हम लोगों के बारे में सुनते हैं कि वे रात-रात भर काम करते हैं। वे रात भर जागते हैं और ऑफिस में सोते हैं। किसी प्रोजेक्ट के लिए खुद को खत्म कर लेना सम्मान की बात मानी जाती है। 

कोई भी काम बहुत ज़्यादा नहीं होता। यह काम के प्रति जुनूनी होना न केवल अनावश्यक है, बल्कि बेवकूफी भी है। ज़्यादा काम करने का मतलब यह नहीं है कि आप ज़्यादा परवाह करते हैं या ज़्यादा काम करते हैं। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि आप ज़्यादा काम करते हैं। काम के प्रति जुनूनी लोग जितनी समस्याओं का समाधान करते हैं, उससे ज़्यादा समस्याएँ खड़ी कर देते हैं। सबसे पहले, इस तरह से काम करना समय के साथ टिकाऊ नहीं होता। जब बर्नआउट क्रैश आएगा--और यह आएगा--तो यह और भी ज़्यादा नुकसान पहुँचाएगा। काम के प्रति जुनूनी लोग भी इस बात को नहीं समझ पाते। वे समस्याओं को ठीक करने के लिए घंटों मेहनत करते हैं। 

वे बौद्धिक आलस्य की भरपाई बलपूर्वक करने की कोशिश करते हैं। इसका नतीजा बेढंगे समाधान के रूप में सामने आता है। वे संकट भी पैदा करते हैं। वे ज़्यादा कुशल होने के तरीके नहीं खोजते क्योंकि उन्हें ज़्यादा काम करना पसंद है। उन्हें हीरो जैसा महसूस करना अच्छा लगता है। वे (अक्सर अनजाने में) समस्याएँ खड़ी करते हैं ताकि वे ज़्यादा काम करके खुश हो सकें। काम के प्रति जुनूनी लोग उन लोगों को "सिर्फ़" उचित घंटों तक काम करने के लिए अपर्याप्त महसूस कराते हैं जो देर तक नहीं रुकते। इससे हर जगह अपराध बोध और खराब मनोबल पैदा होता है। साथ ही, यह एक ऐसी मानसिकता को जन्म देता है--लोग दायित्व के कारण देर तक रुकते हैं, भले ही वे वास्तव में उत्पादक न हों। अगर आप सिर्फ़ काम करते हैं, तो आपके पास सही निर्णय लेने की संभावना नहीं है। 

आपके मूल्य और निर्णय लेने की क्षमता गलत हो जाती है। आप यह तय करने में सक्षम नहीं होते कि क्या अतिरिक्त प्रयास के लायक है और क्या नहीं। और आप बस थके हुए हो जाते हैं। थके होने पर कोई भी तेज़ निर्णय नहीं लेता। अंत में, काम के प्रति जुनूनी लोग वास्तव में गैर-काम के प्रति जुनूनी लोगों से ज़्यादा हासिल नहीं कर पाते। वे पूर्णतावादी होने का दावा कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि वे अगले काम पर जाने के बजाय महत्वहीन विवरणों पर ध्यान केंद्रित करके समय बर्बाद कर रहे हैं। काम के प्रति जुनूनी लोग हीरो नहीं होते। वे दिन नहीं बचाते, वे बस उसका इस्तेमाल करते हैं। असली हीरो तो घर पर ही है क्योंकि उसने काम जल्दी निपटाने का तरीका खोज लिया है।

कम भार  के विचार को अपनाएँ। अभी, आप सबसे छोटे, सबसे दुबले और सबसे तेज़ हैं। यहाँ से, आप भार जमा करना शुरू कर देंगे। और कोई वस्तु जितनी ज़्यादा भारी होगी, उसकी दिशा बदलने के लिए उतनी ही ज़्यादा ऊर्जा की ज़रूरत होगी। यह व्यापार जगत में उतना ही सच है जितना कि भौतिक जगत में। 

भार बढ़ता है - दीर्घकालिक अनुबंध, अतिरिक्त कर्मचारी, स्थायी, निर्णय, बैठकें ,लम्बी प्रक्रिया, इन्वेंट्री (भौतिक या मानसिक), हार्डवेयर, सॉफ़्टवेयर और प्रौद्योगिकी लॉक-इन, दीर्घकालिक रोड मैप, कार्यालय की राजनीति। 


जब भी संभव हो इन चीज़ों से बचें। इस तरह, आप आसानी से दिशा बदल पाएँगे। बदलाव करना जितना महंगा होगा, आपके इसे करने की संभावना उतनी ही कम होगी।

बड़े संगठनों को बदलने में सालों लग सकते हैं। वे काम करने के बजाय बात करते हैं। वे काम करने के बजाय मिलते हैं। लेकिन अगर आप अपना द्रव्यमान कम रखते हैं, तो आप जल्दी से कुछ भी बदल सकते हैं: अपना पूरा व्यवसाय मॉडल, उत्पाद, फीचर सेट और/या मार्केटिंग संदेश। आप गलतियाँ कर सकते हैं और उन्हें जल्दी से ठीक कर सकते हैं। आप अपनी प्राथमिकताएँ, उत्पाद मिश्रण या फ़ोकस बदल सकते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात, आप अपना मन बदल सकते हैं।

"मेरे पास पर्याप्त समय/पैसा/लोग/अनुभव नहीं है।" रोना बंद करो। कम होना अच्छी बात है। बाधाएँ छिपे हुए लाभ हैं। सीमित संसाधन आपको जो मिला है उसी से काम चलाने के लिए मजबूर करते हैं। बर्बादी के लिए कोई जगह नहीं है। और यह आपको रचनात्मक होने के लिए मजबूर करता है। क्या आपने कभी कैदियों को साबुन या चम्मच से हथियार बनाते देखा है? 

वे जो मिला है उसी से काम चलाते हैं। अब हम यह नहीं कह रहे हैं कि आपको बाहर जाकर किसी को चाकू मारना चाहिए--लेकिन रचनात्मक बनें और आप आश्चर्यचकित होंगे कि आप थोड़े से प्रयास से क्या बना सकते हैं। लेखक रचनात्मकता को मजबूर करने के लिए हमेशा बाधाओं का उपयोग करते हैं। शेक्सपियर सॉनेट्स एक विशिष्ट तुकबंदी योजना के साथ आयंबिक पेंटामीटर में चौदह-पंक्ति की गीतात्मक कविताएँ की सीमाओं में आनंद लेते थे। हाइकू और लिमेरिक्स में भी सख्त नियम होते हैं जो रचनात्मक परिणाम देते हैं। अर्नेस्ट हेमिंग्वे और रेमंड कार्वर जैसे लेखकों ने पाया कि खुद को सरल, स्पष्ट भाषा का उपयोग करने के लिए मजबूर करने से उन्हें अधिकतम प्रभाव देने में मदद मिली। इतिहास का सबसे लंबे समय तक चलने वाला गेम शो, द प्राइस इज़ राइट, भी बाधाओं को स्वीकार करने से पैदा हुई रचनात्मकता का एक बेहतरीन उदाहरण है। इस शो में सौ से ज़्यादा गेम हैं, और हर एक गेम इस सवाल पर आधारित है कि "इस आइटम की कीमत कितनी है?" इस सरल सूत्र ने तीस से ज़्यादा सालों से प्रशंसकों को आकर्षित किया है। साउथवेस्ट--ज़्यादातर दूसरी एयरलाइनों के विपरीत, जो कई विमान मॉडल उड़ाती हैं--

केवल बोइंग 737 उड़ाती है। नतीजतन, साउथवेस्ट का हर पायलट, फ्लाइट अटेंडेंट और ग्राउंड-क्रू मेंबर किसी भी फ्लाइट में काम कर सकता है। साथ ही, साउथवेस्ट के सभी पार्ट्स उसके सभी विमानों में फिट होते हैं। इसका मतलब है कि लागत कम होगी और व्यवसाय चलाना आसान होगा। उन्होंने इसे अपने लिए आसान बना लिया। जब हम बेसकैंप बना रहे थे, तो हमारे पास बहुत सी सीमाएँ थीं। हमारे पास मौजूदा क्लाइंट के काम के साथ चलने के लिए एक डिज़ाइन फ़र्म थी, प्रिंसिपल के बीच सात घंटे का समय अंतर डेविड डेनमार्क में प्रोग्रामिंग कर रहे थे, हममें से बाकी लोग अमेरिका में थे, एक छोटी सी टीम और कोई बाहरी फंडिंग नहीं थी। इन बाधाओं ने हमें उत्पाद को सरल रखने के लिए मजबूर किया। आजकल, हमारे पास ज़्यादा संसाधन और लोग हैं, लेकिन फिर भी हम बाधाओं को लागू करते हैं। हम सुनिश्चित करते हैं कि एक समय में एक उत्पाद पर सिर्फ़ एक या दो लोग ही काम करें। और हम हमेशा सुविधाओं को न्यूनतम रखते हैं। इस तरह से खुद को बॉक्स में रखने से हम फूले हुए उत्पाद बनाने से बचते हैं। इसलिए इससे पहले कि आप "पर्याप्त नहीं" का रोना रोएँ, देखें कि आपके पास जो है, उससे आप कितनी दूर तक पहुँच सकते हैं।

बहुत सी कंपनियाँ अगली बड़ी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करती हैं। वे जो गर्म और नया है उस पर ध्यान केंद्रित करती हैं। वे नवीनतम रुझानों और प्रौद्योगिकी का अनुसरण करती हैं। यह एक मूर्खतापूर्ण रास्ता है। आप पदार्थ के बजाय फैशन पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर देते हैं। आप उन चीज़ों पर ध्यान देना शुरू कर देते हैं जो लगातार बदलती रहती हैं बजाय उन चीज़ों के जो स्थायी हैं। आपके व्यवसाय का मूल उन चीज़ों के इर्द-गिर्द बनाया जाना चाहिए जो नहीं बदलेंगी। ऐसी चीज़ें जो लोग आज और दस साल बाद भी चाहते हैं। ये वो चीज़ें हैं जिनमें आपको निवेश करना चाहिए। अमेज़न तेज़ या मुफ़्त शिपिंग, बढ़िया चयन, दोस्ताना वापसी नीतियों और किफ़ायती कीमतों पर ध्यान केंद्रित करता है। इन चीज़ों की हमेशा उच्च मांग रहेगी। 

जापानी ऑटोमेकर भी उन मूल सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो नहीं बदलते: विश्वसनीयता, सामर्थ्य और व्यावहारिकता। लोग तीस साल पहले भी यही चीज़ें चाहते थे, आज भी यही चीज़ें चाहते हैं और तीस साल बाद भी यही चीज़ें चाहेंगे। ई - फसल   के लिए, गति, सरलता, उपयोग में आसानी और स्पष्टता जैसी चीज़ें हमारा ध्यान केंद्रित करती हैं। ये शाश्वत इच्छाएँ हैं। लोग दस साल बाद जागकर यह नहीं कहेंगे, "यार, काश सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना मुश्किल होता।" वे यह नहीं कहेंगे, "काश यह एप्लीकेशन धीमी होती।" याद रखें, फैशन फीका पड़ जाता है। जब आप स्थायी सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आप ऐसी चीजों के साथ बिस्तर पर होते हैं जो कभी भी फैशन से बाहर नहीं होती हैं।

अपना सिर नीचे करके सिर्फ़ वही काम करना आसान है जो आपको लगता है कि किया जाना चाहिए। अपना सिर ऊपर उठाकर यह पूछना बहुत मुश्किल है कि क्यों। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं जो आपको यह सुनिश्चित करने के लिए खुद से पूछने चाहिए कि आप वह काम कर रहे हैं जो मायने रखता है: आप यह क्यों कर रहे हैं? क्या आपने कभी खुद को बिना यह जाने कि क्यों काम कर रहे हैं? किसी ने आपको ऐसा करने के लिए कहा है। यह वास्तव में बहुत आम बात है। इसलिए यह पूछना ज़रूरी है कि आप किस काम पर काम कर रहे हैं। यह किस लिए है? इसका फ़ायदा किसे होगा? इसके पीछे क्या प्रेरणा है? इन सवालों के जवाब जानने से आपको काम को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। आप कौन सी समस्या हल कर रहे हैं? समस्या क्या है? क्या ग्राहक भ्रमित हैं? क्या आप भ्रमित हैं? क्या कुछ स्पष्ट नहीं है? क्या कुछ ऐसा था जो पहले संभव नहीं था जो अब संभव होना चाहिए? कभी-कभी जब आप ये सवाल पूछते हैं, तो आप पाते हैं कि आप एक काल्पनिक समस्या हल कर रहे हैं। 

तब यह समय रुककर यह मूल्यांकन करने का होता है कि आप क्या कर रहे हैं। क्या यह वास्तव में उपयोगी है? क्या आप कुछ उपयोगी बना रहे हैं या सिर्फ़ कुछ बना रहे हैं? उत्साह को उपयोगिता के साथ भ्रमित करना आसान है। कभी-कभी थोड़ा खेलना और कुछ बढ़िया बनाना ठीक है। लेकिन अंततः आपको रुकना होगा और खुद से पूछना होगा कि क्या यह भी उपयोगी है। बढ़िया खत्म हो जाता है। उपयोगी कभी नहीं होता। क्या आप मूल्य जोड़ रहे हैं? कुछ जोड़ना आसान है; मूल्य जोड़ना कठिन है। क्या आप जिस चीज़ पर काम कर रहे हैं वह वास्तव में आपके उत्पाद को ग्राहकों के लिए अधिक मूल्यवान बना रही है? क्या वे इससे पहले की तुलना में अधिक लाभ उठा सकते हैं? कभी-कभी ऐसी चीज़ें जो आपको मूल्य जोड़ने वाली लगती हैं वास्तव में उससे कम हो जाती हैं। बहुत ज़्यादा केचप फ्राइज़ को खराब कर सकता है। 

मूल्य संतुलन के बारे में है। क्या इससे व्यवहार बदलेगा? क्या आप जिस चीज़ पर काम कर रहे हैं वह वास्तव में कुछ बदलने वाली है? जब तक कि इसका लोगों पर वास्तविक प्रभाव न पड़े तब तक कुछ न जोड़ें। क्या कोई आसान तरीका है? जब भी आप किसी चीज़ पर काम कर रहे हों, तो पूछें, "क्या कोई आसान तरीका है?" आप अक्सर पाएंगे कि यह आसान तरीका अभी के लिए काफ़ी है। समस्याएँ आमतौर पर बहुत सरल होती हैं। हम बस कल्पना करते हैं कि उन्हें कठोर समाधान की आवश्यकता है। इसके बजाय आप क्या कर सकते हैं? आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह सीमित संसाधनों वाली छोटी टीमों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। तब प्राथमिकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि आप एक विषय  पर काम करते हैं, तो क्या आप अप्रैल से पहले दूसरे या तीसरे पर कर सकते हैं? यदि नहीं, तो क्या आप एक के बजाय दूसरे या तीसरे पर करना चाहेंगे? यदि आप किसी चीज़ पर लंबे समय तक अटके हुए हैं, तो इसका मतलब है कि ऐसी अन्य चीज़ें हैं जो आप नहीं कर पा रहे हैं। क्या यह वास्तव में इसके लायक है? क्या आप जो कर रहे हैं वह वास्तव में इसके लायक है? क्या यह मीटिंग छह लोगों को एक घंटे के लिए उनके काम से निकालने के लायक है? क्या आज रात पूरी रात जागने के लायक है, या आप इसे कल ही खत्म कर सकते हैं? क्या किसी प्रतिस्पर्धी की प्रेस रिलीज़ को लेकर इतना तनावग्रस्त होना उचित है? क्या विज्ञापन पर अपना पैसा खर्च करना उचित है? जो आप करने जा रहे हैं उसका वास्तविक मूल्य निर्धारित करें। ऊपर सूचीबद्ध प्रश्न खुद से और दूसरों से पूछते रहें। आपको इसे औपचारिक प्रक्रिया बनाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इसे अनदेखा भी न करें। साथ ही, अपने निष्कर्षों के बारे में डरपोक न बनें। कभी-कभी जिस काम पर आप काम कर रहे हैं उसे छोड़ देना सही कदम होता है, भले ही आपने पहले ही बहुत मेहनत की हो। खराब काम के बाद अच्छा समय बर्बाद न करें।













अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  दस


उद्यमिता की  शुरूआत 


दोस्तों ! अथ उद्यमिता अनुशासन के पिछले नौ अध्याय पड़ कर आप यह अंदाज़ा लगाने में सक्षम हो गये होंगे कि आप में वह गुण है या नहीं जो एक इंटरप्रेन्योर में स्टार्टअप शुरू करने के पूर्व होने आवश्यक है। शायद आपने सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ पड़ी या सुनी होगी जब उज्जैन के नये राजा ने पूर्व राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने की कोशिश कि तो सिंहासन के बत्तीस खम्बों से एक-एक कर एक-एक पुतली ने निकाल कर राजा को विक्रमादित्य के अलग-अलग गुणों का वर्णन कर उससे पूछा कि क्या आप में यह गुण है तो ही आप इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी हैं और राजा तब तक उस सिंहासन पर नहीं बैठा जब तक उसने अपने अंदर उन गुणों का विकास नहीं कर लिया। तो आप को भी इंटरप्रेन्योर की यात्रा जब तक शुरू नहीं करना चाहिए जब तक आपके अंदर इंटरप्रेन्योर बनने के शुरूआतीं  गुण न हो। 

तो आईए जब आप अभी तक इसे पड़ना जारी रखे है तो आप ने इंटरप्रेन्योर बनने के सपने को पूरा करने का निश्चय कर लिया है। तो हम इस यात्रा के चरण दर चरण को समझना शुरू करते है पहला चरण - छोटी शुरूआत करे - जब भी कोई फ़र्स्ट टाईम इंटरप्रेन्योर अपने स्टार्टअप आइडिया के साथ मुझे मिलता है तो मैंने हमेशा पाया कि वह जिस सेक्टर में काम शुरू करना चाहता है तो वह उस सेक्टर में सब कुछ बदलने का इरादा ले कर चलता है। वह सोचता है कि अभी तक किसी भी व्यक्ति को इस तरह का यूनिक आइडिया नहीं आया है वह पहला व्यक्ति है। यह भावना वैसी ही है जैसे पहला प्यार होने पर भाव आता है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है बल्कि यह स्वभाविक है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जिसमें बड़ा व ज़्यादा होना स्वाभाविक रूप से बेहतर माना जाता है। लेकिन आपने एक कहावत सुनी होगी “थिंकिं ग्लोबल एक्ट लोकल” हमें बड़ी सोच रखना चाहिए पर शुरू आँत छोटे से ही करना चाहिए। हम सभी जानते है कि एक अच्छे विचार का कोई मौद्रिक मूल्य नहीं होता। 

बड़े विचार से बड़ी कम्पनी बनाई जा सकती है, बड़े बाज़ार पर क़ब्ज़ा किया जा सकता है व बड़ी फ़ंडिंग उठाईं जा सकती है। लेकिन लोग शुरू न कर फ़ंडिंग उठाने की तलाश में लग जाते है और फ़ंडिंग न मिलने के कारण निर्माण, सृजन और नवाचार करने के अपने सपने को छोड़ देते है। आज यूनिकॉर्न स्टार्टअप की शुरू आत बहुत छोटे स्तर पर ही हुई थी चाहे वह जमेटो या फ़ेसबुक हो ये फ़ंडिंग के नोटों के पहाड़ पर शुरू नहीं हुई थी। 

जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को हम आज देखते है उन कम्पनियों की स्थापना बहुत साधारण परिवार से आने वाले लोगों द्वारा की गई थी। वॉल्ट डिज़्नी ने कहा था कि “यदि आप सपना देख सकते है तो इसे पूरा कर सकते है।” योग की परंपरा में “धारणा” की अवधारणा प्राचीन काल से है। द सी क्रेट किताब में लॉ आफ अट्रेक्शन के विचार को बहुत लोकप्रिय बनाया। धीरूभाई अम्बानी द्वारा रिलायंस, कारसन भाई द्वारा निरमा, विजय शेखर शर्मा द्वारा पेटीएम, शिव नाडार द्वारा एचसीएल, नारायण मूर्ति द्वारा इन्फ़ोसिस, अनिल अग्रवाल द्वारा वेदांता व किरण मजूमदार शॉ द्वारा बायकोन आदि कम्पनियों की शुरूआत बहुत छोटे स्तर से हुई थी। अच्छे विचार को छोड़ने की बजाय छोटे स्तर पर शुरू करना हमेशा सरल है। श्री सोहन लाल द्विवेदी जी की कविता है “ कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।” 

एक बेहतरीन उत्पाद या सेवा बनाने का सबसे आसान और सीधा तरीका है

कुछ ऐसा बनाना जिसे आप इस्तेमाल करना चाहते हैं। इससे आप वह डिज़ाइन कर सकते हैं जो आप जानते हैं--और

आप तुरंत पता लगा लेंगे कि आप जो बना रहे हैं वह अच्छा है या नहीं।

जब आप कोई उत्पाद या सेवा बनाते हैं, तो आप हर दिन सैकड़ों छोटे-छोटे फ़ैसलों पर फ़ैसला लेते हैं। अगर आप किसी और की समस्या का समाधान कर रहे हैं, तो आप लगातार अंधेरे में छुरा घोंप रहे हैं। जब आप अपनी समस्या का समाधान करते हैं, तो रोशनी आती है।

आपको ठीक-ठीक पता होता है कि सही उत्तर क्या है। आविष्कारक जेम्स डायसन ने अपनी खुजली खुद ही खरोंची। अपने घर में वैक्यूम करते समय, उन्हें एहसास हुआ कि उनके बैग वैक्यूम क्लीनर की सक्शन पावर लगातार कम हो रही थी - धूल बैग के छिद्रों को बंद कर रही थी और हवा के प्रवाह को रोक रही थी। यह किसी और की काल्पनिक समस्या नहीं थी; यह एक वास्तविक समस्या थी जिसका उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया था। इसलिए उन्होंने इस समस्या को हल करने का फैसला किया और दुनिया का पहला चक्रवाती, बैगलेस वैक्यूम क्लीनर बनाया। * विक फ़र्थ को बोस्टन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा के लिए टिम्पनी बजाते समय बेहतर ड्रमस्टिक बनाने का विचार आया। 

वे जो स्टिक खरीद सकते थे, वे काम के लिए उपयुक्त नहीं थीं, इसलिए उन्होंने घर के तहखाने में ड्रमस्टिक बनाना और बेचना शुरू कर दिया। फिर एक दिन उन्होंने फर्श पर ढेर सारी स्टिक गिराईं और सभी अलग-अलग पिचें सुनीं। तभी उन्होंने नमी की मात्रा, वजन, घनत्व और पिच के आधार पर स्टिक का मिलान करना शुरू किया ताकि वे एक जैसे जोड़े बन सकें। इसका नतीजा उनके उत्पाद की टैग लाइन बन गई: "परफेक्ट जोड़ी।" आज, विक फ़र्थ की फैक्ट्री में प्रतिदिन 85,000 से ज़्यादा ड्रमस्टिक्स बनते हैं और ड्रमस्टिक्स के बाज़ार में इसकी 62 प्रतिशत हिस्सेदारी है। + ट्रैक कोच बिल बोवरमैन ने तय किया कि उनकी टीम को बेहतर, हल्के रनिंग शूज़ की ज़रूरत है। 

इसलिए वे अपनी कार्यशाला में गए और परिवार के वफ़ल आयरन में रबर डाला। इस तरह नाइकी के मशहूर वफ़ल सोल का जन्म हुआ। ++ इन लोगों ने अपनी खुद की खुजली मिटाई और ऐसे लोगों का एक बड़ा बाज़ार खोला जिन्हें बिल्कुल वही चाहिए था जिसकी उन्हें ज़रूरत थी। आपको भी ऐसा ही करना चाहिए। जब ​​आप अपनी ज़रूरत की चीज़ें बनाते हैं, तो आप प्रॉक्सी के बजाय जल्दी और सीधे तौर पर जो बनाते हैं उसकी गुणवत्ता का भी आकलन कर सकते हैं। मैरी के कॉस्मेटिक्स की संस्थापक मैरी के वैगनर जानती थीं कि उनके स्किन-केयर उत्पाद बहुत अच्छे हैं क्योंकि वे खुद उनका इस्तेमाल करती थीं। उन्हें ये उत्पाद एक स्थानीय कॉस्मेटोलॉजिस्ट से मिले थे जो मरीजों, रिश्तेदारों और दोस्तों को घर पर बनाए गए फ़ॉर्मूले बेचते थे। जब कॉस्मेटोलॉजिस्ट का निधन हो गया, तो वैगनर ने परिवार से फ़ॉर्मूले खरीदे। 

उसे यह जानने के लिए फ़ोकस समूहों या अध्ययनों की ज़रूरत नहीं थी कि उत्पाद अच्छे थे। उसे बस अपनी त्वचा को देखना था। * सबसे अच्छी बात यह है कि "अपनी समस्या को खुद हल करें" दृष्टिकोण आपको उस चीज़ से प्यार करने देता है जिसे आप बना रहे हैं। आप समस्या और उसके समाधान के महत्व को अच्छी तरह से जानते हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। आखिरकार, आप उम्मीद है आने वाले कई सालों तक इस पर काम करेंगे। शायद अपनी बाकी ज़िंदगी भी। यह कुछ ऐसा होना चाहिए जिसकी आपको वाकई परवाह हो।

हम सभी के पास एक ऐसा दोस्त होता है जो कहता है, "मेरे पास एक विचार था। अगर मैंने उस पर काम किया होता, तो मैं अरबपति होता!" यह तर्क दयनीय और भ्रामक है।एक विचार होने का कम्पनी  बनाने से कोई लेना-देना नहीं है। आप क्या करते हैं, यह मायने रखता है, न कि आप क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं या क्या योजना बनाते हैं। क्या आपको लगता है कि आपका विचार इतना मूल्यवान है? तो इसे बेचने की कोशिश करें और देखें कि आपको इसके लिए क्या मिलता है। शायद इसका जवाब बहुत ज़्यादा नहीं है। जब तक आप वास्तव में कुछ बनाना शुरू नहीं करते, तब तक आपका शानदार विचार बस एक विचार ही है। और हर किसी के पास ऐसा ही एक विचार होता है। स्टेनली कुब्रिक ने महत्वाकांक्षी फिल्म निर्माताओं को यह सलाह दी: "एक कैमरा और कुछ फ़िल्म लें और किसी भी तरह की फ़िल्म बनाएँ।" * कुब्रिक जानते थे कि जब आप किसी चीज़ में नए होते हैं, तो आपको निर्माण शुरू करना होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है शुरू करना। इसलिए एक कैमरा लें, रिकॉर्ड करें और शूटिंग शुरू करें। विचार सस्ते और प्रचुर मात्रा में होते हैं। मूल पिच विचार किसी व्यवसाय का इतना छोटा हिस्सा है कि यह लगभग नगण्य है। असली सवाल यह है कि आप इसे कितनी अच्छी तरह से क्रियान्वित करते हैं।

लोग सबसे आम बहाना देते हैं: "पर्याप्त समय नहीं है।" वे दावा करते हैं कि वे कोई कंपनी शुरू करना, कोई वाद्य यंत्र सीखना, कोई आविष्कार बेचना, कोई किताब लिखना या कुछ भी करना पसंद करेंगे, लेकिन दिन में पर्याप्त घंटे नहीं होते। 

चलो। अगर आप इसे सही तरीके से खर्च करते हैं तो हमेशा पर्याप्त समय होता है। और यह मत सोचिए कि आपको अपनी नौकरी छोड़नी होगी। इसे बनाए रखें और रात में अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू करें। टीवी देखने या वर्ल्ड ऑफ वॉरक्राफ्ट खेलने के बजाय, अपने विचार पर काम करें। दस बजे सोने के बजाय, ग्यारह बजे सो जाएँ। 

हम पूरी रात या सोलह घंटे काम करने की बात नहीं कर रहे हैं - हम सप्ताह में कुछ अतिरिक्त घंटे निकालने की बात कर रहे हैं। कुछ शुरू करने के लिए यह पर्याप्त समय है। एक बार जब आप ऐसा कर लेंगे, तो आपको पता चल जाएगा कि आपकी उत्सुकता और रुचि वास्तविक है या बस एक क्षणिक चरण। अगर यह सफल नहीं होता है, तो आप बस हर दिन काम पर जाते रहें जैसे आप हमेशा से करते आए हैं। आपने कुछ भी जोखिम में नहीं डाला या कुछ भी नहीं खोया, सिवाय थोड़े समय के, इसलिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। जब आप किसी चीज को बहुत बुरी तरह से चाहते हैं, तो आप समय निकाल लेते हैं - अपने अन्य दायित्वों की परवाह किए बिना। सच्चाई यह है कि ज़्यादातर लोग उसे बहुत बुरी तरह से नहीं चाहते। फिर वे समय के बहाने से अपने अहंकार की रक्षा करते हैं। बहाने बनाकर खुद को दोष न दें। अपने सपनों को साकार करना पूरी तरह से आपकी ज़िम्मेदारी है। इसके अलावा, सही समय कभी नहीं आता। आप हमेशा बहुत छोटे या बूढ़े या व्यस्त या कंगाल या कुछ और होते हैं। अगर आप हमेशा चीजों को सही समय पर करने के बारे में चिंता करते हैं, तो वे कभी नहीं होंगी।

गति प्रेरणा को बढ़ाती है। यह आपको आगे बढ़ने में मदद करती है। यह आपको प्रेरित करती है। इसके बिना आप कहीं नहीं जा सकते। अगर आप जिस काम पर काम कर रहे हैं, उससे प्रेरित नहीं हैं, तो यह बहुत अच्छा नहीं होगा। गति बनाने का तरीका है कि आप कुछ काम पूरा करें और फिर अगले काम पर लग जाएँ। 

कोई भी व्यक्ति अंतहीन प्रोजेक्ट पर अटका रहना पसंद नहीं करता, जिसका कोई अंत नज़र न आए। नौ महीने तक लगातार काम करते रहना और उसके लिए कुछ भी न कर पाना वाकई बहुत बुरा होता है। आखिरकार यह आपको थका देता है। अपनी गति और प्रेरणा को बनाए रखने के लिए, रास्ते में छोटी-छोटी जीत हासिल करने की आदत डालें। एक छोटा सा सुधार भी आपको गति का एक अच्छा झटका दे सकता है। किसी काम को पूरा करने में जितना ज़्यादा समय लगेगा, उसे पूरा करने की संभावना उतनी ही कम होगी। किसी काम को करने और फिर ग्राहकों को उसे करने देने से उत्साह आता है। एक साल के लिए मेन्यू प्लान करना बोरिंग होता है। 

नया मेन्यू तैयार करना, खाना परोसना और फीडबैक पाना रोमांचक होता है। इसलिए बहुत लंबा इंतजार न करें--अगर आप ऐसा करेंगे तो आपकी चिंगारी बुझ जाएगी। अगर आपको निश्चित रूप से दीर्घकालिक परियोजनाओं पर काम करना है, तो सप्ताह में एक दिन या हर दो सप्ताह में छोटी-छोटी जीत के लिए समर्पित करने का प्रयास करें जो उत्साह पैदा करती हैं। छोटी-छोटी जीत आपको जश्न मनाने और अच्छी खबरें जारी करने का मौका देती हैं। और आप चाहते हैं कि अच्छी खबरों का एक निरंतर प्रवाह बना रहे। 

जब हर दो सप्ताह में कुछ नया घोषित करने के लिए होता है, तो आप अपनी टीम को ऊर्जा देते हैं और अपने ग्राहकों को उत्साहित करने के लिए कुछ देते हैं। इसलिए खुद से पूछें, "हम दो सप्ताह में क्या कर सकते हैं?" और फिर उसे करें। इसे लोगों तक पहुँचाएँ और लोगों को इसका उपयोग करने दें, इसका स्वाद चखने दें, इसे खेलने दें या जो भी करें। यह जितनी जल्दी ग्राहकों के हाथों में पहुँचेगा, उतना ही बेहतर होगा।

कई बार हीरो बनने से हार मान लेना बेहतर होता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आपको लगता है कि कोई काम दो घंटे में पूरा हो सकता है। लेकिन चार घंटे बाद भी आप अभी भी सिर्फ़ एक चौथाई काम ही कर पाए हैं। स्वाभाविक प्रवृत्ति यह सोचना है, "लेकिन मैं अब हार नहीं मान सकता, मैंने इस पर पहले ही चार घंटे बिता दिए हैं!" तो आप हीरो मोड में चले जाते हैं। आप इसे कामयाब बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं (और थोड़ा शर्मिंदा भी हैं कि यह पहले से ही कामयाब नहीं हो रहा है)। आप अपना लबादा पकड़ते हैं और खुद को दुनिया से अलग कर लेते हैं। और कभी-कभी इस तरह का सिर्फ़ प्रयास ही काम कर जाता है। 

लेकिन क्या यह इसके लायक है? शायद नहीं। जब आपने सोचा कि यह काम दो घंटे में पूरा हो जाएगा, सोलह घंटे में नहीं, तो यह काम इसके लायक था। उन सोलह घंटों में आप कई दूसरे काम कर सकते थे। साथ ही, आप खुद को फीडबैक से दूर कर लेते हैं, जो आपको और भी गलत रास्ते पर ले जा सकता है। यहां तक ​​कि हीरो को भी कभी-कभी नई नज़र की ज़रूरत होती है-- कोई और जो उन्हें सच्चाई से रूबरू कराए। हमने इस समस्या का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। 

इसलिए हमने तय किया कि अगर किसी काम में हमें दो सप्ताह से ज़्यादा समय लगता है, तो हमें दूसरे लोगों को बुलाकर उसे देखना चाहिए। हो सकता है कि वे उस काम पर कोई काम न करें, लेकिन कम से कम वे जल्दी से उसकी समीक्षा कर सकते हैं और अपनी राय दे सकते हैं। कभी-कभी एक स्पष्ट समाधान आपके सामने होता है, लेकिन आप उसे देख भी नहीं पाते। ध्यान रखें कि स्पष्ट समाधान शायद काम छोड़ना ही हो। लोग काम छोड़ने को विफलता से जोड़ देते हैं, लेकिन कभी-कभी आपको यही करना चाहिए। अगर आपने पहले ही किसी ऐसी चीज़ पर बहुत ज़्यादा समय बिताया है जो इसके लायक नहीं थी, तो उसे छोड़ दें। आप उस समय को वापस नहीं पा सकते। सबसे बुरी बात जो आप अभी कर सकते हैं, वह है और ज़्यादा समय बर्बाद करना।

कभी-कभी नकल करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, जैसे कि जब आप किसी कला छात्र को संग्रहालय में पेंटिंग की नकल करते हुए देखते हैं या ड्रमर को लेड ज़ेपेलिन के "मोबी डिक" पर जॉन बोनहम के एकल के साथ बजाते हुए देखते हैं। 

जब आप एक छात्र होते हैं, तो इस तरह की नकल आपकी खुद की आवाज़ की खोज के मार्ग पर एक सहायक उपकरण हो सकती है। दुर्भाग्य से, व्यवसाय के क्षेत्र में नकल करना आमतौर पर अधिक नापाक होता है। शायद यह कॉपी-पेस्ट की दुनिया के कारण है जिसमें हम इन दिनों रह रहे हैं। आप किसी के शब्दों, छवियों या कोड को तुरंत चुरा सकते हैं। और इसका मतलब है कि नकल करके व्यवसाय बनाने की कोशिश करना लुभावना है। 

हालाँकि, यह विफलता का एक सूत्र है। इस तरह की नकल के साथ समस्या यह है कि यह समझ को छोड़ देता है - और समझ ही वह तरीका है जिससे आप आगे बढ़ते हैं। आपको यह समझना होगा कि कोई चीज़ क्यों काम करती है या कोई चीज़ वैसी क्यों है जैसी वह है। जब आप सिर्फ़ कॉपी और पेस्ट करते हैं, तो आप उसे मिस कर देते हैं। 

आप नीचे की सभी परतों को समझने के बजाय बस अंतिम परत का पुन: उपयोग करते हैं। एक मूल निर्माता किसी चीज़ में जो काम करता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा अदृश्य होता है। यह सतह के नीचे दबा होता है। नकल करने वाला वास्तव में नहीं जानता कि कोई चीज़ क्यों वैसी दिखती है या वैसी महसूस होती है या वैसी क्यों पढ़ती है। नकल एक नकली फिनिश है। यह कोई सार नहीं देती, कोई समझ नहीं देती और भविष्य के निर्णयों को आधार बनाने के लिए कुछ भी नहीं देती। साथ ही, अगर आप नकल करने वाले हैं, तो आप कभी भी नहीं चल सकते। आप हमेशा निष्क्रिय स्थिति में रहते हैं। आप कभी नेतृत्व नहीं करते; आप हमेशा अनुसरण करते हैं। आप ऐसी चीज़ को जन्म देते हैं जो पहले से ही समय से पीछे है - बस एक नकल, मूल का एक घटिया संस्करण। जीने का यह कोई तरीका नहीं है। आपको कैसे पता चलेगा कि आप किसी की नकल कर रहे हैं? अगर कोई और ज़्यादातर काम कर रहा है, तो आप नकल कर रहे हैं। प्रभावित हों, लेकिन चोरी न करें।

















अथ उद्यमिता अनुशासन  

अध्याय  ग्यारह 


उद्यमिता की  शुरूआत

दूसरा चरण हमारे मन में हमेशा ऊहापोह चलतीं रहतीं है कि उद्यमिता की  शुरूआत करने के लिए कितना ज्ञान पर्याप्त है? इस बात का जबाब जानने के लिए हमें ऐसे लोगों के जीवन को देखना होगा जो हाल ही के वर्षों में सफल स्टार्टअप रहे है। स्टार्टअप को उनकी वैल्यूएशन के अनुसार सफलता के विभिन्न स्तर पर रखा जाता है तथा अलग-अलग नाम दिए जाते है जो इस तरह है- 


मिनीकॉर्न स्टार्टअप

जिन स्टार्टअप का वैल्यूएशन 10 लाख डॉलर यानी 8.3 करोड़ रुपये से अधिक है उन्हें मिनीकॉर्न स्टार्टअप कहा जाता है. आमतौर पर शुरुआती दौर के सभी स्टार्टअप की वैल्यू इतनी ही होती है और इस क्लब के स्टार्टअप में शामिल होना बेहद आसान है.


सूनीकॉर्न स्टार्टअप 

जिन स्टार्टअप की वैल्यूएशन 8.3 करोड़ से ज्यादा है और जल्द ही वह 10 लाख डॉलर यानी यूनिकॉर्न के स्तर पहुंचने वाले हैं, इस तरह के स्टार्टअप को सूनीकॉर्न स्टार्टअप स्टार्टअप कहते हैं. मौजूदा वक्त में भारत में कुल 50 ऐसे स्टार्टअप हैं जो यूनिकॉर्न स्टार्टअप बनने की रेस में शामिल है.


यूनिकॉर्न स्टार्टअप

आमतौर पर जब भी स्टार्टअप की बात होती है तो यूनिकॉर्न स्टार्टअप  का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है. यह एक प्रकार का स्टार्टअप है जिसकी वैल्यूएशन 1 अरब डॉलर यानी 8,319 करोड़ रुपये से अधिक है. साल 2013 में सबसे पहले इस शब्द का इस्तेमाल काउबॉय वेंचर के फाउंडर एलिन ली द्वारा किया गया था. भारत में मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देशभर में यूनिकॉर्न स्टार्टअप की संख्या 108 है. वहीं साल 2025 तक इसकी संख्या 150 होने की संभावना है.



डेकाकॉर्न स्टार्टअप

जिन स्टार्टअप की वैल्यूएशन 10 अरब डॉलर से अधिक होती है उन्हें डेकाकॉर्न स्टार्टअप कहा जाता है. दुनिया में इस तरह के स्टार्टअप की संख्या बेहद कम है. क्रंचबेस यूनिकॉर्न बोर्ड के जनवरी 2023 के डाटा के अनुसार विश्व भर में केवल 47 ऐसे कंपनियां हैं जो डेककॉर्न स्टार्टअप की कैटेगरी में आती हैं.


हेक्टोकॉर्न स्टार्टअप

'होक्टो' एक ग्रीक शब्द है जिसका मतलब है सौ यानी जिन कंपनियों का वैल्यूएशन 100 अरब डॉलर यानी 8.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक है उन्हें हेक्टोकॉर्न स्टार्टअप कंपनी कहा जाता है. इसे 'सुपर यूनिकॉर्न' भी कहा जाता है. एलन मस्क की स्पेसएक्स अक्टूबर 2021 में हेक्टोकॉर्न स्टार्टअप की कैटेगरी में शामिल होने वाली पहली कंपनी बनी थी. इस कैटेगरी में गूगल, एप्पल जैसी कंपनियों का नाम भी शामिल है. भारत की कोई भी कंपनी इस कैटेगरी में शामिल नहीं है.

लिंक्डइन की तरफ से भारत के टॉप-20 स्टार्टअप  की लिस्ट जारी की गई है, जो 2023 में तेजी से बढ़ रहे हैं. इस लिस्ट को चार पैमानों पर बनाया है गया है, जो रोजगार में ग्रोथ, एंगेजमेंट, जॉब इंट्रेस्ट और टॉप टैलेंट को अपनी ओर खींचने पर आधारित है । इस सूची में पहले स्थान पर है ऑनलाइन ग्रॉसरी डिलीवरी ऐप ज़ेप्टो। इस के के सह-संस्थापक आदित पालिचा ने दुबई में जीईएमएस मॉडर्न एकेडमी से गणित और कंप्यूटर विज्ञान में आईबी डिप्लोमा के साथ स्नातक किया है।

 दूसरे स्थान पर है गुरुग्राम का स्टार्टअप ब्लू स्मार्ट। इसकी शुरुआत 2018 में हुई थी और कंपनी में करीब 620 लोग काम करते हैं. यह कंपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल के जरिए दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु में राइडिंग की सेवा मुहैया कराती है. कंपनी की फ्लीट में करीब 4500 इलेक्ट्रिक कारें हैं और इसी साल के अंत तक इसमें 10 हजार कारें शामिल करने की योजना है.ब्लूस्मार्ट के सह-संस्थापक पुनीत के गोयल ने एस्टन बिजनेस स्कूल से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एमएससी और एस्टन विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (डीबीए) में मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।

तीसरे स्थान पर है  डिट्टो इंश्योरेंस साल 2018 में शुरू हुआ बेंगलुरु के इस स्टार्टअप ने 250 से भी अधिक लोगों को रोजगार दिया है. यह इंश्योरटेक स्टार्टअप तमाम पॉलिसी के प्लान को तुलना करने और इसके ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से इंश्योरेंस खरीदने की सुविधा देता है.  पवन कुमार राय, डिट्टो इंश्योरेंस के सह-संस्थापक की शैक्षिक पृष्ठभूमि विविध है, जिसमें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान और वित्तीय सेवाएं शामिल हैं।

इसलिए यह कहना कि किस तरह का कितना ज्ञान स्टार्टअप को सफल बनाने के लिए आवश्यक है बताना सम्भव नहीं है। अगर आपके पास कोई कारोबार का विचार है और वह विचार आपको सोने नहीं देता है तो स्टार्टअप की दुनिया में आपका स्वागत है। 

स्टीव जॉब्स अमेरिकी बिजनेस मैग्नेट और एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स की अधिकृत स्व-शीर्षक जीवनी है। यह पुस्तक जॉब्स के अनुरोध पर वाल्टर इसाकसन द्वारा लिखी गई थी, जिसमें उन्होंने स्टीव जॉब्स के कुछ सफलता के फ़ॉर्मूले लिखे हैं। 

स्टीव जॉब्स कहते है कि “अगर आपका महान कार्य करने का सपना है तो एक ही तरीक़ा है जो भी काम करें उससे जी भर प्यार करे।” वह मानते थे कि सफलता एक रात में नहीं मिलती, हर कामयाबी के पीछे बहुत सारे दिनों की मेहनत होतीं है। वह कहते थे कि आप के पास समय कम है इसलिए इसे किसी और की ज़िंदगी जी कर बरबाद मत करो। “ स्टे हंगरी स्टे फुलिश” उनका प्रसिद्ध वाक्य है। वह हमेशा “थिंक डिफ़रेंट” पर ज़ोर देते थे। 

अमेरिका व चीन के बाद भारत स्टार्टअप का तीसरा सबसे बड़ा देश है। तो हमें कैसे पता चलेगा कि हम स्टार्टअप शुरू कर सकते है तो इसका एक ही जवाब है “आत्म विश्वास” यदि आप में आत्म विश्वास है तो आप कुछ भी कर सकते है। आप का जनून व सेल्फ़ मोटिवेशन ही अन्ततः आप को संघर्ष करते रहने के लिए प्रेरित करता है। धैर्य के साथ काम करते हुए जोखिम उठाने की क्षमता ही आप को उद्यमी बनातीं है। हमें असफलता कैलंडर से ऊपर उठकर काम करने की ज़रूरत होती है। 

काम के पास एक प्रेरणादायी कहानी होना चाहिए जिसकी दम पर आप एक अच्छी टीम बना पाते है, निवेशकों को आकर्षित कर सकते है व ऐसे ग्राहकों को आकर्षित कर सकते है जो पैसे दे कर आपके उत्पाद व सेवाओं को ख़रीदने को तैयार हो। 

हमेशा लोग आप को सलाह देते है कि जिस तरह का आप स्टार्टअप करना चाहते है उस तरह की किसी कम्पनी में आप नौकरी कर अनुभव लेवे। लेकिन जब आप नौकरी करने लगते हैं तो जॉब छोड़ कर अपना काम शुरू करने के पूर्व पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के लिए वित्तीय समस्याओं का सामना करना होगा। कारोबार की बहुत समझ उसकी कठिनाइयों से भी परिचित करवातीं है तो कई बार कठिनाइयों को देखते हुए निर्णय लेना कठिन होता है। 

यहाँ सफलता का कोई नक़्शा नहीं होता, कोई फ़ार्मूला नहीं होता यह हर व्यक्ति की अलग-अलग यात्रा होती है क्योंकि हर व्यक्ति के लिए देश, काल व परिस्थितियाँ अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के लक्ष्य, सफलता की परिभाषा अलग-अलग होती है तो उन्हें उन का रास्ता व रणनीति का ख़ुद चुनाव करना चाहिए। दूसरों के अनुभव, ग़लतियाँ व सलाह सुन कर सीख सकते है पर निर्णय स्वयं ले। श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को पूरी गीता सुना कर कहा “ यथेच्छसि तथा कुरू” जैसी तेरी इच्छा हो वैसा तुम करो। तो यही वाक्य हर उद्यमी के लिए है कि कोई भी जोखिम न उठाना ही सबसे बड़ा जोखिम होता है। 



अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  बारह 


स्टार्टअप की विफलता के कारण 


हर स्टार्टअप इंटरप्रेन्योर का सपना होता है ‘यूनिकॉर्न स्टार्टअप’ कम्पनी बनाना। लेकिन मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में दस में से नौ स्टार्टअप तीन साल के अंदर विफल हो जाते है। विफलता की हर इंटरप्रेन्योर की एक कहानी होती है, जिनसे पता चलता है कि विफलता किसी एक कारण से नहीं होती वर्ना यह रिपल इफ़ेक्ट होता है, जब कोई गड़बड़ी किसी कम्पनी की किसी एक प्रणाली में शुरू होती है और फिर बाहर की ओर फैलती है, जिससे कम्पनी के बड़े हिस्से पर असर पड़ता है और कई बार परिस्थितियाँ कॉन्ट्रोल के बाहर चली जाती है जिससे कम्पनी में अस्तित्व का संकट आ जाता है। 

इससे यह स्पष्ट है कि स्टार्टअप की विफलता कई कारणों का संयोजन होता है। जैसे आपका बिज़नेस माडल टिकाऊ या लाभदायक नहीं है तो आप जल्दी ही नक़दी खो देंगे - पैसे के बिना आगे नहीं बढ़ सकते- विकास के संकेत नहीं दिखने पर फ़ंडिंग प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है और इस तरह स्टार्टअप में रिपल इफ़ेक्ट का दुश्चक्र प्रारंभ होता है।फॉर्च्यून पत्रिका के स्टार्टअप की असफलता के एक सर्वेक्षण के अनुसार कोई ख़रीदना नहीं चाहता 42%, कैश की कमी 29%, टीम में तालमेल की कमी 23%, प्रतिस्पर्धा में न टिक पाने से 19%, क़ीमत या लागत से जुड़े मसले 18%, गुणवत्ता की कमी 17%, बिज़नेस माडल की कमी 17%, कमजोर मार्केटिंग 14%, ग्राहकों को नज़रअंदाज़ करना 14%, समयबद्धता की कमी 13% कारणों से स्टार्टअप विगत वर्षों में बंद हों गये। 

भारत में सन् 2024 में बंद होने वाले 12 स्टार्टअप्स है। जिनमें एग्रीटेक स्टार्टअप ग्रीनिक्क बढ़ते घाटे के आगे झुक गया। केले की खेती पर केंद्रित एग्रीटेक स्टार्टअप ग्रीनिक्क सितंबर में उत्पाद-बाजार में अपनी जगह बनाने में असमर्थता और बढ़ते घाटे के कारण बंद हो गया। एक ऐप विकसित करने और खुद को एक पारिस्थितिकी तंत्र सुविधाकर्ता के रूप में स्थापित करने के बावजूद, स्टार्टअप को अंततः कार्यशील पूंजी की पेशकश करने वाले एक और विक्रेता के रूप में देखा गया। उस समय, ग्रीनिक्क के सह-संस्थापक और सीईओ फारिक नौशाद ने बताया कि उधारकर्ताओं द्वारा ऋण वसूली न होना संचालन को बंद करने के निर्णय के पीछे प्रमुख कारणों में से एक था।

अपने जीवनकाल में, स्टार्टअप ने 100 यूनिकॉर्न से कुल 8.4 करोड़ रुपये जुटाए। एडटेक संकट के बीच ब्लूलर्न ने लॉन्च होने के तीन साल से ज़्यादा समय बाद, सोशल लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म को  जुलाई में  बंद कर दिया,क्योंकि  वेंचर-स्केल व्यवसाय बनाने में चुनौतियों और तेज़ विकास हासिल करने में मुश्किलें आ रही थीं। 2021 में हरीश उथयकुमार और श्रेयांस संचेती द्वारा स्थापित, ब्लूलर्न ने छात्रों के लिए एक टेलीग्राम चैनल के रूप में शुरुआत की, जहाँ वे एक-दूसरे के सामान्य सवालों पर मदद करते थे। एडटेक स्टार्टअप ने दावा किया कि उसके पास 20 से ज़्यादा देशों के 5,500 से ज़्यादा कॉलेजों के 1,50,000 से ज़्यादा सदस्यों का समुदाय है। अपने जीवनकाल में, बेंगलुरु स्थित इस स्टार्टअप ने एलिवेशन कैपिटल, लाइटस्पीड और अन्य से $3.95 मिलियन जुटाए थे।

जेन ए आई  स्टार्टअप InsurStaq.ai के संस्थापक, मायन कंसल ने स्केलिंग संघर्षों के बीच परिचालन बंद कर दिया। भारत में जनरेटिव एआई  क्षेत्र में चल रही उछाल का हिस्सा होने के बावजूद, दिल्ली  स्थित स्टार्टअप  ने व्यवसाय को स्केल करने में आने वाली चुनौतियों के कारण सितंबर में अपने परिचालन को बंद करने का फैसला किया।

गोल्डपे द्वारा स्थापना के एक साल बाद ही अपनी दुकान बंद करने का फैसला किया। दोषपूर्ण बिज़नेस मॉडल और नकदी संकट से प्रभावित पार्थ शाह और याग्नि रावलजी द्वारा सह-स्थापित, अहमदाबाद स्थित फिनटेक स्टार्टअप गोल्डपे ने स्थायी राजस्व प्रवाह की अनुपस्थिति, दोषपूर्ण व्यवसाय मॉडल और नकदी प्रवाह के मुद्दों के कारण स्टार्टअप के परिचालन को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पूंजी जुटाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।  शुरुआती फंडिंग खत्म होने के साथ, दोनों ने गोल्डपे को चालू रखने के लिए नए निवेश की सक्रिय रूप से तलाश की, लेकिन असफल रहे। स्टार्टअप एक साल में केवल 1.5 लाख रुपये का राजस्व उत्पन्न कर सका।

पीक XV, BEENEXT समर्थित केनको हेल्थ ने  परिचालन बंद करने का फैसला किया क्योंकि उसके पास फंड खत्म हो गया था और वह भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण  से बीमा लाइसेंस हासिल नहीं कर सका। शटडाउन के समय, सह-संस्थापक अनिरुद्ध सेन ने एक ईमेल में साझा किया, जिसमें कहा गया था, "दुर्भाग्य से, कंपनी के पास फंड खत्म हो गया है, और हम विभिन्न आंतरिक कारणों से समय पर इक्विटी पूंजी डालने में असमर्थ थे। हमारी कंपनी को एक डेट फंड द्वारा राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण में ले जाया गया है जिसने हमें ऋण दिया था।" शटडाउन के महीनों बाद, सेन ने आरोप लगाया कि भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण में लालफीताशाही उन घटनाओं के लिए जिम्मेदार थी, जिसके कारण स्टार्टअप का पतन हुआ।

 2022 में आकाश गोयल और मोहित चितलांगिया द्वारा स्थापित, फिनटेक स्टार्टअप ने परिचालन बंद करने का फैसला किया क्योंकि इसे एक विश्वसनीय व्यवसाय मॉडल का पता लगाना मुश्किल हो गया था।

अप्रमेय राधाकृष्ण और मयंक बिदावतका द्वारा 2020 में स्थापित, बेंगलुरु स्थित कू एक भारतीय माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म था और ट्यूटर का प्रतियोगी था। ऑनलाइन मीडिया फ़र्म डेलीहंट के साथ लंबे समय तक अधिग्रहण की चर्चा विफल होने के बाद इसने अपने बंद होने की घोषणा की। हालाँकि, कू के पतन का सबसे बड़ा कारण यह था कि यह पिछले दो वर्षों में भयंकर फंडिंग विंटर के बीच निवेशकों द्वारा अपने पर्स को कसने के कारण फंड जुटाने में विफल रहा। 

टाइगर ग्लोबल, एक्सेल, 3one4 कैपिटल, कलारी कैपिटल और ब्लूम वेंचर्स जैसे प्रमुख निवेशकों से $50 मिलियन से अधिक जुटाने के बावजूद, स्टार्टअप को अपने सीरीज़ सी राउंड के लिए कोई खरीदार नहीं मिला क्योंकि वित्तीय स्थिति पर्याप्त प्रभावशाली नहीं थी। इसके बंद होने का एक और बड़ा कारण इसकी बिगड़ती वित्तीय सेहत थी। शुरुआत से ही, स्टार्टअप बढ़ते घाटे और न्यूनतम राजस्व से जूझ रहा था।

अपने प्रमुख शेयरधारक और निवेशक सुब्रत रॉय के निधन के बाद, आध्यात्मिक तकनीक स्टार्टअप माई तीर्थ इंडिया ने फंड की कमी के कारण अगस्त, 2024 में “अस्थायी रूप से” परिचालन बंद करने का फैसला किया। सहारा इंडिया परिवार के संस्थापक और प्रबंध निदेशक रॉय ने स्टार्टअप में लगभग 1 मिलियन डॉलर का निवेश किया था

अप्रैल में, AI-संचालित डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफ़ॉर्म निंटी ने अपने बंद होने की घोषणा की, जबकि शेष पूंजी निवेशकों को वापस कर दी। सह-संस्थापक और सीईओ पारस चोपड़ा ने पीक XV पार्टनर्स समर्थित स्टार्टअप के बंद होने का कारण उपयोगकर्ता प्रतिधारण और स्केलिंग की चुनौतियों को बताया। यह निर्णय स्टार्टअप द्वारा अज्ञात निवेशकों से $3 मिलियन जुटाने के एक साल बाद लिया गया।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि ऐसा नहीं है कि केवल बिना फंड के स्टार्टअप बंद हो जाते है बल्कि सच तो यह है कि फ़ंडिंग के बावजूद स्टार्टअप बंद हो जाते है। क्योंकि जितना अधिक फ़ंडिंग होती है समस्याएँ भी उतनी अधिक होती है। हैरानी की बात यह है कि फ़ंडिंड स्टार्टअप की विफलता पैसे से जुड़े मुद्दों के कारण हो जाती है। सन् 2009 में हमारे देश की सफलता कम्पनी सत्यम के रामलिंग राजू जिन्होंने चेयरमैन के पद से इस्तीफा देते समय कहा था कि ‘यह बाघ की सवारी करने जैसा था, यह नहीं जानते हुए कि बिना खाए कैसे उतरना है।’ यह उनकी  दुखद कहानी को समेटने के लिए एक बेहतरीन उद्धरण है। चीनी उद्यमी जैक माँ कहते है कि ‘जब आप के पास पैसा होता है तो आप ग़लतियाँ करते है।’ जैक माँ ने ही कहा था कि ‘जब आप के पास एक मिलियन डॉलर है तो आप एक भाग्यशाली व्यक्ति है। लेकिन जब आप के पास दस मिलियन डॉलर है तो आप संकट में है, बहुत बड़ा सर दर्द।’  समाज में तीन तरह के लोग है पहले वे जो दूसरों की ग़लतियों से सीख लेते है, दूसरे तरह के निरंतर स्वयं ग़लतियाँ करके सीखते हैं और ग़लतियाँ दुहराते नहीं है तथा तीसरे तरह के लोग न दूसरों की ग़लतियों से सीख लेते है और न स्वयं की ग़लतियों से। 

वे निरंतर एक जैसी ग़लतियाँ करते है। तो आप आकलन करें कि आप किस तरह के इंटरप्रेन्योर है। क्योंकि जब आप कोई निर्णय लेते है तो या तो आप पैसे कमाते या गमाते है, बीच का कोई रास्ता नहीं होता है। इसलिए एक सफल इंटरप्रेन्योर को बिज़नेस में छोटी से छोटी बात को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। इंटरप्रेन्योर निरंतर दूसरों की ग़लतियों से सीख कर आगे बढ़े अन्यथा स्वयं ग़लतियाँ कर सीखने के लिए एक जीवन कम पड़ता है। इसलिए सफल इंटरप्रेन्योर निरंतर किताबें पड़ते है , सोशल मीडिया पर अपने आप को अपडेट करते है और नेटवर्किंग करते रहते है। 

एलोन मस्क $221,400 मिलियन की कुल संपत्ति के साथ, आज दुनिया के सबसे सफल व्यवसायियों में से एक हैं। उन्होंने PayPal की सह-स्थापना की, स्पेसएक्स की स्थापना की, और टेस्ला मोटर्स के सीईओ हैं। मस्क को छोटी उम्र से ही विज्ञान-कथा उपन्यास पढ़ना पसंद था और वह रोजाना लगभग 10 घंटे पढ़ते थे। जब वह सिर्फ नौ साल के थे, तब उन्होंने पूरा एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पढ़ लिया था!

माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स कहते है कि "प्रत्येक पुस्तक ज्ञान के नए रास्ते खोलती है," गेट्स अमेरिकी व्यवसायी, निवेशक, सॉफ्टवेयर डेवलपर और परोपकारी व्यक्ति को अपने खाली समय में किताबें पढ़ना पसंद है।गेट्स हर साल लगभग 50 किताबें पढ़ते हैं, जो लगभग एक सप्ताह में एक किताब है।वह आमतौर पर व्यवसाय, विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, विश्व मामलों और इंजीनियरिंग के बारे में गैर-काल्पनिक किताबें पढ़ना पसंद करते हैं। बर्कशायर हैथवे

वॉरेन बफेट बर्कशायर हैथवे के चेयरमैन और सीईओ को दुनिया के पांचवें सबसे धनी व्यक्ति का दर्जा दिया गया है।वॉरेन बफेट दुनिया के सबसे सफल निवेशकों में से एक हैं। बफेट ने जब एक निवेशक के रूप में अपना करियर शुरू किया था, तब वे प्रतिदिन 600-1,000 पेज पढ़ते थे।अब वे प्रतिदिन 500 पेज के वित्तीय दस्तावेज पढ़ते हैं और प्रतिदिन पांच-छह घंटे तक पांच अलग-अलग अखबार पढ़ते हैं।

अमेरिकी अरबपति उद्यमी और टेलीविजन व्यक्तित्व मार्क क्यूबान अमेरिकी बास्केटबॉल टीम डलास मावेरिक्स के मालिक हैं। वे अपनी सफलता में पढ़ने को एक प्रमुख कारक मानते हैं क्योंकि इससे उन्हें उस उद्योग के बारे में अधिक जानने में मदद मिली जिसमें वे शामिल हैं। क्यूबन हर रोज़ तीन घंटे पढ़ते हैं और कोई भी किताब या पत्रिका उठाकर पढ़ते हैं।

अमेरिकी अरबपति व्यवसायी डेविड रूबेनस्टीन वाशिंगटन स्थित निजी इक्विटी फर्म द कार्लाइल ग्रुप के सह-संस्थापक हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे सफल निजी निवेश फर्मों में से एक है।

3600 मिलियन डॉलर की कुल संपत्ति के साथ, रूबेनस्टीन हर हफ्ते कम से कम छह किताबें और रोजाना आठ अखबार पढ़ते हैं। वह अपने दिमाग को केंद्रित करने के लिए हर दिन पढ़ने के माध्यम से नई चीजें सीखने के लिए जुनूनी है।

टोनी रॉबिंस शराबी माँ और कई अपमानजनक पिताओं के साथ बड़े हुए। वह किताबों को अपनी ज़िंदगी बचाने और आज के नेता के रूप में आकार देने का श्रेय देते हैं। पढ़ने ने उनके अंदर एक जुनून जगाया। "मैंने एक स्पीड-रीडिंग कोर्स किया और सात सालों में 700 किताबें पढ़ीं- सभी मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान, ऐसी किसी भी चीज़ पर जो जीवन में बदलाव ला सकती है।"

लिंकडिन के एक ब्लाग पोस्ट में सिद्धार्थ राजसेकर में लिखा कि जब मैं सुपर सफल लोगों की पढ़ने की आदतों पर शोध कर रहा था, तो मुझे कुछ दिलचस्प आँकड़े मिले:

- 88% अमीर लोग हर दिन कम से कम 30 मिनट पढ़ते हैं।

- औसत सीईओ एक साल में 60 से ज़्यादा किताबें पढ़ता है और कंपनी की औसत आय का 319 गुना कमाता है।

- 63% अमीर लोग अपने ड्राइव टाइम के दौरान ऑडियो बुक सुनते हैं

- 79% सुपर सफल लोग शिक्षा और करियर से जुड़ी सामग्री पढ़ते हैं।

- उनमें से 55% व्यक्तिगत विकास के लिए पढ़ते हैं।

- 94% सुपर अमीर लोग वर्तमान घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं।

- उनमें से 51% इतिहास के बारे में पढ़ते हैं।

- 58% सफल लोग जीवनी पढ़ते हैं।

- केवल 11% अमीर लोग मनोरंजन के उद्देश्य से किताबें पढ़ते हैं।

तो निष्कर्ष यह कि आप किताबें, आडियो, व्हिडिओ, पोडकास्ट, सोशल मीडिया पर अपने ज्ञान को बड़ाने में उपयोग कर सकते है। अब एआई एप व टूल्स के कारण किसी भी तरह का ज्ञान आपके फ़िंगर टिप पर उपलब्ध है। पेरप्लेक्सिटी, ओपन एआई चैट जीपीटी, टिकटॉक, चीनी जनरेटिव एआई प्लेटफॉर्म डीपसीक एक निःशुल्क एआई-संचालित उत्तर इंजन है जो किसी भी प्रश्न का सटीक, विश्वसनीय और वास्तविक समय पर उत्तर देने की ओर निरंतर कुशलता हासिल कर रहे है।  
















अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  तेरह 


मानस पुत्र का बीजारोपण एवं  जन्म 


तो दोस्तों ! जब हम यह निश्चित कर लेते है की स्टार्टअप की शुरुआत करना है तो इस का कीड़ा हमें कटाने लगता है। उठाते, बैठते, सोते,जागते, दोस्तों के साथ बातें करते हमें चारो तरफ स्टार्टअप के आइडिया मन में तैरने लगते है। अनेक बार ऐसा होता ही है कि बात आप अपने दोस्त से कर रहे होते है और बाहर आप ऐसे दिखाते हो की आप उसकी बात सुन रहे हो, लेकिन अन्दर आप के अचेतन मन में स्टार्टअप का आइडिया आ जाता है तब भौतिक रूप में तो वहाँ होते है लेकिन मानसिक रूप से अनुपस्थित हो जाते है। आप की फ्रैंड एकदम से समझ जाती है और आप पकड़े जाते है। यह प्रतिक्रिया आप के अंदर जानबूझ कर नहीं होती है यह अनजाने में ही चलती रहती है। आप का नियंत्रण मन से हट जाता है। इससे अनेकबार झगड़े हो जाते है। 

स्टार्टअप फाउंडर के साथ ऐसा ही होता है। यह वह जुम्मन कीड़ा है जो जब आप को काट लेता है तो फिर आप उसके बस में हो जाते है। आप नींद में चलने वाले बन जाते है। स्वप्न ऐसा देखो जो आपको सोने न दे।  फिर आप को इन सब आइडिया में से एक को चुनना होता है वही आप का मानस पुत्र है जिसका जन्म स्टार्टअप के रूप में होता है। 



स्टार्टअप का नामकरण एवं रजिस्ट्रेशन


आप अपने मानस पुत्र का एक ऐसा नाम सोचते हो जो आप के काम से सबन्ध रखता हो, यूनिक हो, बोलने में सरल हो, आसानी से याद रहे और सुरीला हो। आप अपने कम्पनी सेक्रेटरी से मिल कर अपने स्टार्टअप के नाम की खोज वेबसाइट पर यह जांचने के लिए सर्च करते हो कि यह नाम  पंजीकरण के लिए उपलब्ध है या नहीं, क्योकि स्टार्टअप की वेबसाइट का डोमिन नाम तथा  कंपनी का  रजिस्ट्रर्ड र नाम एक ही हो तो व्यवसाय के लिए अच्छा होता है। 

कम्पनी के रजिस्ट्रेशन की इस प्रक्रिया के लिए कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय  के साथ विभिन्न फॉर्म और दस्तावेज़ दाखिल करने और कंपनी को रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़  के तहत पंजीकृत करने की आवश्यकता होती है। व्यवसाय संचालित करने के लिए एक नई इकाई की स्थापना चाहे वह इकाई लाभ-प्राप्त करने वाला संगठन हो, गैर-लाभकारी संगठन हो, स्टार्टअप हो या सूक्ष्म, लघु या मध्यम-स्तरीय व्यवसाय हो  पंजीकरण करना अनिवार्य है। पंजीकरण में स्ट्रटअप को एक नई कानूनी इकाई बनाना होता है, जिसे कानून के तहत एक व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जाती है। कारपोरेट मामलों का मंत्रालय एक भारतीय सरकारी मंत्रालय है और  भारत में पंजीकृत कंपनियों की गतिविधियों को  कंपनी अधिनियम 2013 और अन्य प्रासंगिक कानूनों के माध्यम से नियंत्रित करता है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने एक नियामक ढांचा स्थापित किया है जिसका कंपनी का नामकरण करते समय पालन किया जाना चाहिए। यदि चुना गया नाम कारपोरेट मामलों के मंत्रालय  के दिशा-निर्देशों को पूरा करने में विफल रहता है, तो पंजीकरण  के लिए दिया गया आवेदन अस्वीकार किया जा सकता है। यह ट्रेडमार्क है और इस का पंजीकरण होना व्यापार करने के लिए अनियार्य है। 

स्टार्टअप इंडिया के साथ अपने स्टार्टअप को पंजीकृत करने के चरण 

चरण 1: अपना व्यवसाय निगमित करें

आपको सबसे पहले अपने व्यवसाय को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म या एक सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) के रूप में निगमित करना होगा। आपको किसी भी व्यवसाय के पंजीकरण के लिए सभी सामान्य प्रक्रियाओं का पालन करना होगा जैसे पंजीकरण आवेदन जमा करना और निगमन/साझेदारी पंजीकरण का प्रमाण पत्र प्राप्त करना।

आप अपने क्षेत्र के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) को पंजीकरण आवेदन दाखिल करके एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या एक सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) निगमित कर सकते हैं। आप अपने क्षेत्र के रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स के साथ अपनी फर्म के पंजीकरण के लिए आवेदन दाखिल करके एक साझेदारी फर्म स्थापित कर सकते हैं। आपको पंजीकरण आवेदन के साथ रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज या रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स को आवश्यक दस्तावेज और शुल्क जमा करने होंगे।


चरण 2: स्टार्टअप इंडिया के साथ रजिस्टर करें


इसके बाद व्यवसाय को स्टार्टअप के रूप में पंजीकृत होना चाहिए। पूरी प्रक्रिया सरल और ऑनलाइन है। स्टार्टअप इंडिया की वेबसाइट पर जाएँ और ‘रजिस्टर’ बटन पर क्लिक करें। अपना नाम, ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर, पासवर्ड दर्ज करें और ‘रजिस्टर’ बटन पर क्लिक करें। इसके बाद, आपके ईमेल पर भेजा गया OTP और अन्य विवरण जैसे कि उपयोगकर्ता का प्रकार, स्टार्टअप का नाम और चरण आदि दर्ज करें और ‘सबमिट’ बटन पर क्लिक करें। ये विवरण दर्ज करने के बाद, स्टार्टअप इंडिया प्रोफ़ाइल बनाई जाती है।वेबसाइट पर आपकी प्रोफ़ाइल बनने के बाद, स्टार्टअप वेबसाइट पर विभिन्न त्वरण और इनक्यूबेटर/मेंटरशिप कार्यक्रमों के लिए आवेदन कर सकते हैं, साथ ही सीखने के संसाधनों, फंडिंग विकल्पों, सरकारी योजनाओं और बाजार तक पहुँच प्राप्त कर सकते हैं।


चरण 3: डेपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ़ इण्डस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड विभाग से मान्यता प्राप्त करें


स्टार्टअप इंडिया वेबसाइट पर प्रोफ़ाइल बनाने के बाद अगला चरण डेपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ़ इण्डस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड  विभाग से  मान्यता प्राप्त करना है। यह मान्यता स्टार्टअप को उच्च गुणवत्ता वाली बौद्धिक संपदा सेवाओं और संसाधनों तक पहुँच, सार्वजनिक खरीद मानदंडों में छूट, श्रम और पर्यावरण कानूनों के तहत स्व-प्रमाणन, कंपनी का आसान समापन, फंड ऑफ़ फंड्स तक पहुँच, लगातार 3 वर्षों के लिए कर छूट और उचित बाजार मूल्य से अधिक निवेश पर कर छूट जैसे लाभों का लाभ उठाने में मदद करती है।

डेपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ़ इण्डस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड विभाग से मान्यता प्राप्त करने के लिए, स्टार्टअप इंडिया वेबसाइट पर अपने पंजीकृत प्रोफ़ाइल क्रेडेंशियल के साथ लॉग इन करें और ‘मान्यता’ टैब के तहत डेपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ़ इण्डस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड मान्यता के लिए आवेदन करें’ विकल्प पर क्लिक करें।अगले पेज पर, 'अभी आवेदन करें' पर क्लिक करें। यह नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम  वेबसाइट पर रीडायरेक्ट करेगा। कंपनियों वेबसाइट पर पंजीकरण करना चाहिए, 'स्टार्टअप के रूप में पंजीकरण' फ़ॉर्म जोड़ना चाहिए और डेपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ़ इण्डस्ट्री एंड इंटर्नल ट्रेड की मान्यता प्राप्त करने के लिए 'स्टार्टअप मान्यता फ़ॉर्म' भरना चाहिए।


चरण 4: मान्यता आवेदन


'स्टार्टअप मान्यता फॉर्म' पर, आपको इकाई विवरण, पूरा पता कार्यालय, अधिकृत प्रतिनिधि विवरण, निदेशक/भागीदार विवरण, आवश्यक जानकारी, स्टार्टअप गतिविधियाँ और स्व-प्रमाणन जैसे विवरण भरने होंगे। फॉर्म के दाईं ओर प्लस चिह्न पर क्लिक करें और फॉर्म के प्रत्येक अनुभाग को दर्ज करें। ‘स्टार्टअप मान्यता फॉर्म’ के सभी अनुभागों को दर्ज करने के बाद, नियम और शर्तों को स्वीकार करें और ‘सबमिट’ बटन पर क्लिक करें।


चरण 5: पंजीकरण के लिए दस्तावेज़


आपके स्टार्टअप का निगमन/पंजीकरण प्रमाणपत्र यदि कोई हो तो फंडिंग का प्रमाण कंपनी, एलएलपी या साझेदारी फर्म के अधिकृत प्रतिनिधि का प्राधिकरण पत्र पिच डेक/वेबसाइट लिंक/वीडियो जैसे अवधारणा का प्रमाण (मान्यता/प्रारंभिक ट्रैक्शन/स्केलिंग चरण स्टार्टअप के मामले में)पेटेंट और ट्रेडमार्क विवरण, यदि कोई हो

पुरस्कारों या मान्यता प्रमाणपत्रों की सूची, यदि कोई हो पैन नंबर






चरण 6: मान्यता संख्या


बस! आवेदन करने पर आपको अपने स्टार्टअप के लिए मान्यता संख्या मिल जाएगी। आपके सभी दस्तावेजों की जांच के बाद मान्यता प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा, जो आमतौर पर ऑनलाइन विवरण जमा करने के 2 दिनों के भीतर किया जाता है।


चरण 7: अन्य क्षेत्र


ज़रूरी वैधानिक दस्तावेज - डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन नम्बर, फ़र्म का बैंक एकाउंट्स, आधार कार्ड,  पैन कार्ड, जीएसटी नम्बर, स्थानीय शासन से दुकान खोलने की अनुमति, पेटेंट, ट्रेडमार्क और/या डिज़ाइन पंजीकरण: यदि आपको अपने नवाचार के लिए पेटेंट या अपने व्यवसाय के लिए ट्रेडमार्क की आवश्यकता है, तो आप सरकार द्वारा जारी सुविधाकर्ताओं की सूची में से किसी से भी आसानी से संपर्क कर सकते हैं। आपको केवल वैधानिक शुल्क वहन करना होगा, जिससे आपको शुल्क में 80% की छूट मिलेगी।


वित्तपोषण: कई स्टार्टअप के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में से एक वित्त तक पहुँचना है। अनुभव, सुरक्षा या मौजूदा नकदी प्रवाह की कमी के कारण, उद्यमी निवेशकों को आकर्षित करने में विफल रहते हैं। इसके अलावा, स्टार्टअप की उच्च जोखिम वाली प्रकृति, एक महत्वपूर्ण प्रतिशत के रूप में विफल होने से कई निवेशक दूर हो जाते हैं। वित्तपोषण सहायता प्रदान करने के लिए, सरकार ने  स्टार्टअप को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए  स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम  की स्थापना की है।

रोजगार और श्रम कानूनों के तहत स्व-प्रमाणन: स्टार्टअप श्रम कानूनों और पर्यावरण कानूनों के तहत स्व-प्रमाणन कर सकते हैं ताकि उनकी अनुपालन लागत कम हो। विनियामक बोझ को कम करने के लिए स्व-प्रमाणन प्रदान किया जाता है, जिससे उन्हें अपने मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति मिलती है। स्टार्टअप को निगमन की तारीख से 3 से 5 साल की अवधि के लिए 6 श्रम कानूनों और 3 पर्यावरण कानूनों के तहत अपने अनुपालन को स्व-प्रमाणित करने की अनुमति है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर प्रकाशित 36 श्वेत श्रेणी के उद्योगों के तहत काम करने वाली इकाइयों को 3 साल के लिए 3 पर्यावरण-संबंधी अधिनियमों के तहत मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

कर छूट: स्टार्टअप को 3 साल के लिए आयकर से छूट दी जाती है। लेकिन इन लाभों का लाभ उठाने के लिए, उन्हें अंतर-मंत्रालयी बोर्ड  द्वारा प्रमाणित होना चाहिए। 1 अप्रैल 2016 को या उसके बाद निगमित स्टार्टअप आयकर छूट के लिए आवेदन कर सकते हैं।


स्टार्टअप के व्यक्तित्व का निर्माण 


आप के स्टार्टअप के पंजीयन के साथ आप का मानस पुत्र मन से वास्तविकता के संसार में आ जाता है। अब इसे एक अलग यूनिक पहचान देने की जरुरत होती है उसके लिए कंपनी के लोगो का पंजीकरण ट्रेडमार्क के अंतर्गत होता है, जिससे आपके ब्रांड की पहचान को कानूनी सुरक्षा मिलती है। यह प्रक्रिया ऑनलाइन या ऑफलाइन दोनों तरीकों से की जा सकती है और इसके लिए आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करना होता है। लोगो और 


ब्रांड पंजीकरण के लाभ


यह विभिन्न प्रकार के उत्पादों और सेवाओं की और उनकी कंपनी की पहचान कराता है। यह उत्पाद और सेवाओं के विज्ञापन में मदद करता है। यह उत्पाद और सेवाओं की गुणवत्ता की भी पहचान करता है। लोगो और ब्रांड पंजीकरण के बाद उसके मालिक को उत्पाद और सेवाओं पर प्रयोग में मालिकाना हक़ भी देता है। पंजीकरण होने के बाद किसी अन्य व्यापारी द्वारा आवेदन में शामिल होने का डर भी समाप्त कर दिया जाता है। यदि कोई अन्य व्यापारी, पंजीकृत लोगो और ब्रांड का उपयोग करता है तो मालिक उसकी कानूनी कारवाई कर सकता है। लोगो और ब्रांड रजिस्ट्रेशन से कंपनी और उधमी बाजार और चाहत के बीच अपनी दुकान में शामिल हो जाता है। लोगो और ब्रांड पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज़

ट्रेडमार्क या लोगो की कॉपी, आवेदक का विवरण जैसे: नाम, पता और राष्ट्रीयता और कंपनी के निगमन के लिए,  उत्पाद और सेवाओं के विषय में जानकारी, ट्रेडमार्क के पहले प्रयोग की तारीख, यदि आवेदन करने से पहले प्रयोग किया गया है। आवेदन पर पावर ऑफ अटॉर्नी (पीओए) द्वारा हस्ताक्षर किया गया है।





लोगो और ब्रांड पंजीकरण कैसे करें


एक कंपनी की अलग पहचान के लिए अलग लोगो और ब्रांड की भी जरूरत होती है और ट्रेडमार्क सुरक्षा के लिए ट्रेडमार्क पंजीकरण की भी जरूरत होती है। लोगो तथा ब्रांड आपकी कम्पनी के व्यक्तित्व का प्रतीक होता है अतः इसका निर्माण बहुत सोच समझ कर करना चाहिए। इस में शब्दों का चयन, रंगों का चयन तथा डिजायन का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह सरल आसानी से पहचान में आने वाला तथा कहीं भी प्रिन्ट या पेंट करने में आसान होना चाहिये। इसी से कम्पनी के व्यक्तित्व की झलक मिलती है। 

लोगो रजिस्ट्रेशन कैसे करें और ब्रांड रजिस्ट्रेशन कैसे करें इसकी पूरी प्रक्रिया आज पूरी तरह से ऑनलाइन हो चुकी है। आप कभी भी कहीं से भी अपनी या अपनी कंपनी के लोगो और ब्रांड रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन रजिस्टर कर सकते हैं। 


1.ट्रेडमार्क की उपलब्धता खोज करना


सबसे पहले हमें यह सर्च करना होगा कि आपके व्यवसाय का नाम, ब्रांड और लोगो का पहले से पंजीकरण ना हो।ट्रेडमार्क कार्यालय में ट्रेडमार्क एजेंट और वकील यह खोज करते हैं कि कहीं ट्रेडमार्क पहले से ही तो पंजीकृत नहीं है किसी और कंपनी या व्यक्ति द्वारा, यह हम ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से ही सर्च कर सकते हैं। दोनों तरह की खोजें पूरी तरह से हो रही हैं और यह पुष्टि हो रही है कि ब्रांड अनोखा है। इसके बाद रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर सकते हैं। 


2. ट्रेडमार्क आवेदन भरना


ट्रेडमार्क खोज पूरी तरह से, ट्रेडमार्क एजेंट ट्रेडमार्क आवेदन के लिए आवेदन करता है। अपने अद्वितीय व्यवसाय नाम, ब्रांड और लोगो के लिए,यदि किसी ने एक ही ट्रेडमार्क करा रखा है तो हमें अपना ट्रेडमार्क बदलना जरूरी है, ट्रेडमार्क आवेदन में आपको 2 से 3 दिन का समय लग सकता है। निर्धारित शुल्क के साथ टीएम – फॉर्म भरा जायेगा।


3. ट्रेडमार्क पंजीकरण


ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन के लिए सरकारी शुल्क 4500 है। आवेदन देने के बाद ट्रेडमार्क कार्यालय नामांकित अच्छे से चेक करेगा और देखेगा की कहीं ये चिन्ह पहले से प्रयोग में तो नहीं और किसी को कुछ इस एप्लिकेशन को लेकर कुछ लक्ष्य तो नहीं। इसके लिए रजिस्ट्रार कुछ दिन का समय भी देता है।  

यदि एप्लिकेशन के कोई अविरोधी सिद्धांत नहीं हैं तो रजिस्ट्रार इसके विज्ञापन ट्रेडमार्क जर्नल में प्रकाशन के लिए सुझाव देता है।  यदि अगले 4 महीनों में किसी अन्य व्यवसाय और किसी व्यक्ति द्वारा कोई आपत्ति नहीं की जाती है तो अगले 6 महीनों में आपके ब्रांड और लोगो का ट्रेडमार्क पंजीकरण हो जाएगा। 

यदि किसी के द्वारा भी कोई आपत्ति की जाती है तो सुनवाई के बाद निराकरण किया जाता है। ब्रांड और लोगो का पंजीकरण प्रदान किया जाता है और ब्रांड और लोगो पंजीकरण की 10 साल की वैधता मिलती है। 

 






अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय  चौदह  


अभी काम स्टार्ट करो   


अनुभूतियाँ या आईडिया ब्रह्माण्ड में हमेशा रहते है, वे नाशवान नहीं होते। वे इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो के रूप में ब्रम्हांड में धूम रहे है। हमारा मस्तिष्क इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो को ग्रहण करता है तथा उन्हें प्रक्षेपित भी करता है। जो लोग उस समय उस जगह उस ग्रहणशीलता की मनःस्थिति में होते है वे सब लोग एक साथ एक जैसी अनुभूतियाँ को ग्रहण कर सकते है। जिस अनुभूति पर हमारी चेतना चली जाती है वह अनुभूति हमारा विचार बन जाती है। जिस विचार पर हमारी शारीरिक ऊर्जा लग जाती है वह हमारा कर्म बन जाता है तथा जो कर्म  बार - बार करते है वह हमारी आदत बन जाती है। यही आदत हमारे मन में संस्कार के रूप में विद्यमान रहती  है। 

विचार को कर्म बनाने के लिए प्रेरणा की आवश्यकता होती है। लेकिन प्रेरणा नाशवान होती है। यह ताजे फूल की तरह होती है जिसकी एक समाप्ति की तिथि होती है। यदि आप कुछ करना चाहते है तो अभी करना होगा। यदि आप स्टार्टअप के विचार पर तत्काल काम शुरू नहीं करते है और कल के लिए टाल देते है तो आपकी प्रेरणा कुछ दिनों के बाद नष्ट हो जाती है। इसलिए हमें तभी किसी विचार पर काम शुरू करना होता है जब वह आया है।  तब आपकी ऊर्जा अपने चर्मोत्कर्ष पर होती है। प्ररेणा जादू की तहर है, और उत्पादिता कई गुणा प्रेरक के प्रभाव को बड़ा देती है। लेकिन यह आपका इंतजार नहीं करती है। यह अभी की बात है यदि इसे अभी पकड़ कर आप काम शुरू कर देते है तभी यह आप के काम की है। हम लोग बहुत आसानी से हर बात से प्रेरणा लेने लगते है। ऐसे में हमें अपनी प्राथमिकताऐं निश्चित कर सफलता के लिए लगातार निरंतर काम करना होगा। 


स्टार्टअप्स के लिए गुणवत्तापूर्ण साझेदार 


स्टार्टअप के लिए एक अच्छी साझेदारी बनाने के लिए, पहले साझेदारों के बीच एक स्पष्ट समझौता होना चाहिए, जिसमें भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ, लाभ-हानि का बंटवारा और विवाद समाधान जैसी बातें शामिल हों. साथ ही, वित्तीय योजना और पारदर्शिता बनाए रखना भी ज़रूरी है। कहते हैं न शुरुआत अगर अच्छी हो तो सब अच्छा होता है। 

साझेदारी में भी व्यवसाय का यही पहला नियम है। अपने साझेदार का चयन करने में भावुक न हों। क्षमता और अनुकूलता शैक्षणिक योग्यता से परे हैं। उसे चुनें जिसके पास अनुभव हो, जिससे आपके विचार मिलते हों, और जिस पर भरोसा कर सकते हों। रिश्तेदारों या मित्रों में साझेदारी से बचें क्योंकि इससे निजी संबंध बिगड़ सकते हैं। स्टार्टअप के विभिन्न हितधारकों में कर्मचारी, ग्राहक, निवेशक, शेयरधारक, आपूर्तिकर्ता, समुदाय, सरकारी एजेंसियां और नियामक प्राधिकरण शामिल हैं, जो किसी संगठन या परियोजना से प्रभावित होते हैं या प्रभावित कर सकते हैं। आप अकेले व्यापार नहीं कर सकते है इसलिए आप को यह पता होना चाहिए कि लोगों  से आपकी क्या अपेक्षायें है। आप की क्या - क्या स्किल्स है और कोन सी स्किल्स आप में नहीं जो  बिजनिस के लिए आवश्यक है ? इन रोल्स के लिये आप को ऐसे लोग चाहिए जो आप के परिपूरक हो सके। 

स्टार्टअप के शुरुआत में सही लोगों को आकर्षित करने की कला आपके पास होनी चाहिए। आप के स्टार्टअप की कहानी इतनी वास्तविक तथा आकर्षक हो की लोग उससे प्रभावित हो कर आप के साथ जुड़ना चाहे। क्योंकि शुरू में न तो उतने संसाधन होते है और न सफलता। इस स्टेज पर केवल आपका स्वप्न होता है जिसे आप एक कहानी के माध्यम से बेचते है। 


स्टार्टअप का  बिजनेस प्लान 


एक स्टार्टअप के लिए बिजनेस प्लान एक ऐसा दस्तावेज है जो आपके व्यवसाय के लक्ष्यों, रणनीतियों और योजनाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, जो संभावित निवेशकों और उधारदाताओं को आकर्षित करने और व्यवसाय को सफल बनाने में मदद करता है। एक अच्छी तरह से तैयार बिजनेस प्लान आपके प्लांट को सफलता की राह पर ले जा सकता है, इसलिए इसे चुनें और इसमें समय और प्रयास करें। बिजनेस प्लान दिखाता है कि आपका टारगेट क्या है, आपका स्टार्टअप कैसे ग्रो करेगा, आपकी ग्रोथ स्ट्रेटेजी क्या होगी, पैसों का इंतजाम कैसे होगा और सबसे जरूरी इसमें आपके बिजनेस आइडिया के बारे में सब कुछ डिटेल में होता है।  

बिजनेस प्लान के मुख्य घटक है  कार्यकारी सारांश, व्यवसाय का संक्षिप्त विवरण, जिसमें आपके व्यवसाय का उद्देश्य, लक्ष्य और सम्मिलित शामिल हैं। कंपनी का विवरण,कंपनी के कानूनी रूप, स्वामित्व संरचना, और व्यवसाय के स्थान के बारे में जानकारी। उत्पाद और सेवाएँ, आपके द्वारा अंतिम रूप दिए जाने वाले ढांचे या सेवाओं का विवरण, उनकी विशिष्ट वस्तुएं और उनके मूल्य प्रस्ताव। बाज़ार विश्लेषण, आपके लक्षित बाज़ार, प्रतिस्पर्द्धियाँ, और बाज़ार में आपकी स्थिति का विश्लेषण। विपणन योजना, आपकी रणनीति या सेवाओं को बढ़ावा देने और बेचने के लिए। संगठन और प्रबंधन,कंपनी की संरचना, प्रबंधन टीम और उनके पोर्टफोलियो का विवरण। वित्त योजना, व्यवसाय के लिए धन, आय अनुमान, व्यय अनुमान, और सूक्ष्मता का विश्लेषण आवश्यक है।

अतिरिक्त दस्तावेज़, जैसे कि बाज़ार अनुसंधान डेटा, वित्तीय विवरण, और कानूनी दस्तावेज़।


बिजनेस प्लान बनाने के लिए चरण:


1. विचार को परिभाषित करें: अपने व्यवसाय के बारे में एक स्पष्ट और विशिष्ट विचार विकसित करें।


2. बाजार अनुसंधान: अपने लक्षित बाज़ार, प्रतिस्पर्द्धियाँ, और उद्योग की स्थिति का विश्लेषण करें।


3. लक्ष्य निर्धारित करें: अपने व्यवसाय के लिए विशिष्ट और अभिनव उपयुक्त लक्ष्य निर्धारित करें।


4. वित्त योजना: आपके व्यवसाय के लिए धन, आय अनुमान, व्यय अनुमान, और सूक्ष्मता का विश्लेषण आवश्यक है।


5. बिजनेस प्लान लिस्ट: ऊपर दिए गए सभी को एक साथ रखें और एक स्पष्ट और पेशेवर बिजनेस प्लान जारी करें।


6. बिजनेस प्लान को अपडेट करें: बाजार की स्थिति और आपके व्यवसाय की प्रगति के अनुसार अपने बिजनेस प्लान को नियमित रूप से अपडेट करें।

आज के वक्त में स्टार्टअप कल्चर तेजी से बढ़ रहा है। सरकार भी इसे खूब प्रमोट कर रही है, जिसकी वजह से छोटे शहरों से भी शानदार स्टार्टअप निकल कर आ रहे हैं। हालांकि, अगर आप अपने स्टार्टअप को बड़ा और सफल बनाना चाहते हैं तो आपको जरूरत होती है बहुत सारे फंड की  ये पैसा या तो आपको निवेशकों से मिलता है या फिर आपको बैंक से लोन लेना होता है। इन दोनों की काम के लिए जरूरत होती है एक बिजनेस प्लान की। यह प्लान आप के लिए एक मैप की तरह होता है जो आपको तथा आप की टीम को सही दिशा दिखता है, संसाधनों की जानकारी देता है तथा मॉनीटरिंग के लिए मापदण्ड उपलब्ध करबाता है।  


मार्केटिंग प्लान


एक मार्केटिंग प्लान बनाने के लिए, आपको सबसे पहले अपने व्यवसाय के लक्ष्य, और मार्केटिंग बजट को स्पष्ट करना होगा, फिर सोशल मीडिया मार्केटिंग, और विज्ञापन जैसे विभिन्न मार्केटिंग प्लान का उपयोग करके अपनी रणनीति को लागू करना होगा।


1. व्यवसाय के लक्ष्य और उद्देश्य को परिभाषित करें: आप अपने बजट से क्या हासिल करना चाहते हैं? उदाहरण के लिए, क्या आप ब्रांड जागरूकता बढ़ाना चाहते हैं, बिक्री बिक्री चाहते हैं, या बाज़ार में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं?

आपके उत्पाद या सेवा के लिए सबसे उपयुक्त लक्षित ग्राहक कौन हैं? उनकी आयु, लिंग, आय, रुचि और व्यवहार क्या हैं?


2. विपणन बजट निर्धारित करें: आपको अपनी मार्केटिंग मार्केटिंग के लिए कितना खर्च करना है? अपने बजट को विभिन्न विपणन चैनलों के बीच कैसे निवेश करें?

3. विपणन रणनीति विकसित करें: सोशल मीडिया मार्केटिंग: सोशल मीडिया पर अपने लक्षित उद्यमों के साथ जुड़ें, सामग्री साझा करें, और विज्ञापन विज्ञापन।

बिक्री विपणन: आपके लक्ष्य के लिए उपयोगी और घटिया सामग्री, जैसे कि ब्लॉग पोस्ट, वीडियो, और ई-पुस्तकें। सोशल मीडिया, सर्च इंजन, और अन्य ऑनलाइन चैनलों पर विज्ञापन की पेशकश।

ईमेल मार्केटिंग: अपने इंटरनेट को ईमेल के माध्यम से अपडेट करें और विशेष ऑफर की पेशकश करें।

प्रोत्साहन: अपने उत्पाद या सेवाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए अन्य लोगों के साथ सहयोग करें।


4. विपणन रणनीति लागू करें: अपनी मार्केटिंग रणनीति को लागू करने के लिए सबसे आकर्षक चैनलों का चयन करें।

सामग्री को अनुकूलित करें: अपने लक्ष्य के लिए अपनी सामग्री को अनुकूलित करें।

नियमित रूप से मॉनिटर करें: अपनी मार्केटिंग रणनीति के कार्यान्वयन को नियमित रूप से देखें और आवश्यकतानुसार समायोजित करें।


5. मार्केटिंग योजना का आकलन करें: की परफॉर्मेंस इंडीकेटर्स  निर्धारित करें: परिणामों का विश्लेषण करें: अपनी मार्केटिंग योजना के प्रदर्शन का विश्लेषण करें और अपनी मार्केटिंग रणनीति को बेहतर बनाने के लिए सुझाव प्राप्त करें। शुरूआती दौर में सोशल मीडिया का उपयोग कर सस्ते में मार्केटिंग की जा सकती है। 

 


























अथ उद्यमिता अनुशासन 

अध्याय पन्द्रह  


स्टार्टअप की दुनियां के मिथक 


स्टार्टअप को सपोर्ट करने के लिए इंकुबेशन सेन्टर्स, मेंटोर, कॉर्पोरेट कोच, सेमिनार्स, ऑन लाइन तथा ऑफ लाइन बुक्स, विडिओ, कोर्सेस, ट्रैनिंग मटेरियल उपलब्ध है। लेकिन हमारे यहाँ जो बिजनिस नहीं करता है बही बिजनिस सिखाते है। इस कारण स्टार्टअप की दुनिया में बहुत सारे मिथक फैल गये है। हर स्टार्टअप अनोखा होता है इसलिए यहाँ नकल काम नहीं आती। एक व्यक्ति का अनुभव दूसरे के काम नहीं आता है। हमें अपने विवेक के निर्णय करना होता है। इसलिए मेरी सीख है कि कि "सुनिये सब की करिये मन की"  नीति पर चलना चाहिए। यहाँ कुछ मिथकों के सम्बन्ध में बात करते है -

मिथक 1: आपको एक शानदार विचार की आवश्यकता है

स्टार्टअप विकास के बारे में सबसे प्रचलित गलतफहमियों में से एक यह है कि सफल व्यवसाय शुरू करने के लिए आपको एक शानदार, मौलिक और अभिनव विचार की आवश्यकता होती है। जबकि एक अच्छा विचार होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, यह सफलता की गारंटी देने के लिए पर्याप्त नहीं है। वास्तव में, कई सफल स्टार्टअप नए विचारों पर आधारित नहीं होते हैं, बल्कि किसी विशिष्ट समस्या को हल करने या ग्राहक की ज़रूरत को पूरा करने के लिए मौजूदा समाधानों को बेहतर बनाने, अनुकूलित करने या संयोजित करने पर आधारित होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने विचार को अपने लक्षित बाज़ार के साथ मान्य करें, अपनी मान्यताओं का परीक्षण करें और प्रतिक्रिया और डेटा के आधार पर पुनरावृत्ति करें। सत्यापन, निष्पादन और ग्राहक आकर्षण के बिना एक शानदार विचार बेकार है।


मिथक 2: आपको एक बेहतरीन योजना की आवश्यकता है

स्टार्टअप विकास के बारे में तीसरी गलत धारणा यह है कि आपको अपना व्यवसाय शुरू करने और उसे बढ़ाने के लिए एक बेहतरीन योजना की आवश्यकता होती है। जबकि एक योजना बनाना उपयोगी है, यह उम्मीद करना यथार्थवादी नहीं है कि सब कुछ आपकी प्रारंभिक दृष्टि और रणनीति के अनुसार होगा। स्टार्टअप अनिश्चित और गतिशील वातावरण में काम करते हैं, जहाँ ग्राहकों की प्राथमिकताएँ, बाज़ार की स्थितियाँ और प्रतिस्पर्धी ताकतें तेज़ी से और अप्रत्याशित रूप से बदल सकती हैं। इसलिए, आपको लचीला, अनुकूलनीय और ज़रूरत पड़ने पर मोड़ने या पाठ्यक्रम बदलने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। एक कठोर योजना का पालन करने के बजाय, आपको एक लीन स्टार्टअप पद्धति का पालन करना चाहिए, जिसमें एक न्यूनतम व्यवहार्य उत्पाद बनाना, उसके प्रदर्शन को मापना, ग्राहक प्रतिक्रिया से सीखना और परिणामों के आधार पर अपने उत्पाद को दोहराना या सुधारना शामिल है।


मिथक 3: आपको बहुत सारा पैसा चाहिए

स्टार्टअप डेवलपमेंट के बारे में एक और आम ग़लतफ़हमी यह है कि आपको अपना व्यवसाय शुरू करने और बढ़ाने के लिए बहुत सारा पैसा चाहिए। जबकि कुछ स्टार्टअप को अपने उत्पाद, सेवा या तकनीक को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण पूंजी की आवश्यकता हो सकती है, कई अन्य न्यूनतम संसाधनों के साथ मुनाफ़े के लिए अपना रास्ता बना सकते हैं। बूटस्ट्रैपिंग का मतलब है बाहरी निवेशकों या ऋणों पर निर्भर किए बिना अपने स्टार्टअप को वित्तपोषित करने के लिए अपने स्वयं के धन, राजस्व या बचत का उपयोग करना। यह आपको अपने व्यवसाय पर अधिक नियंत्रण और स्वामित्व बनाए रखने, कमजोर पड़ने और कर्ज से बचने और अपने ग्राहकों के लिए मूल्य बनाने पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। बेशक, बूटस्ट्रैपिंग चुनौतियों और ट्रेड-ऑफ के साथ भी आती है, जैसे धीमी वृद्धि, सीमित नकदी प्रवाह और अधिक जोखिम। हालाँकि, यदि आप दुबले-पतले, मितव्ययी और रचनात्मक हैं तो सफलतापूर्वक बूटस्ट्रैप करना संभव है। आज ऐसे अनेकों स्टार्टअप्स है जो बूटस्ट्रप होकर भी यूनिकॉर्न बन गये जबकि दूसरी ओर मिलियन डालर फण्ड उठाने के बाद भी फेल हो गये। 



मिथक 4: आपको 24/7 काम करने की ज़रूरत है

स्टार्टअप डेवलपमेंट के बारे में चौथी ग़लतफ़हमी यह है कि सफल होने के लिए आपको 24/7 काम करने की ज़रूरत है। जबकि व्यवसाय शुरू करने के लिए कड़ी मेहनत, समर्पण और जुनून की आवश्यकता होती है, इसका मतलब यह नहीं है कि आपको अपने स्वास्थ्य, कल्याण या निजी जीवन का त्याग करना होगा। बहुत ज़्यादा काम करने से बर्नआउट, तनाव, थकान और उत्पादकता और रचनात्मकता में कमी आ सकती है। इसके अलावा, 24/7 काम करने से आप अपने परिवार, दोस्तों और समुदाय से अलग हो सकते हैं, जो आपके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य और समर्थन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए, आपको काम और जीवन के बीच संतुलन बनाने और अपनी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक ज़रूरतों को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है। आप सीमाएँ निर्धारित करके, ब्रेक शेड्यूल करके, कार्य सौंपकर, गतिविधियों को आउटसोर्स करके और ज़रूरत पड़ने पर मदद माँगकर ऐसा कर सकते हैं।


मिथक 5: आपको इसे अकेले ही करना होगा

स्टार्टअप डेवलपमेंट के बारे में पांचवीं गलत धारणा यह है कि आपको इसे अकेले ही करना होगा। उद्यमी होना भले ही अकेलापन और चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको सभी बाधाओं और अवसरों का सामना अकेले ही करना होगा। वास्तव में, एक टीम, एक सह-संस्थापक, एक संरक्षक या एक नेटवर्क होना आपके स्टार्टअप की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। एक टीम या एक सह-संस्थापक आपको कार्यभार साझा करने, आपके कौशल को पूरक बनाने, प्रतिक्रिया देने और आपको प्रेरित करने में मदद कर सकता है। एक संरक्षक या एक नेटवर्क आपको मूल्यवान सलाह, संसाधन, कनेक्शन और अवसरों तक पहुँचने में मदद कर सकता है। इसलिए, आपको ऐसे लोगों की तलाश करने और उनके साथ संबंध बनाने की ज़रूरत है जो आपका समर्थन कर सकें, आपको चुनौती दे सकें और आपकी स्टार्टअप यात्रा के दौरान आपको प्रेरित कर सकें।


मिथक 6: आपको वायरल होने की ज़रूरत है

स्टार्टअप डेवलपमेंट के बारे में छठी ग़लतफ़हमी यह है कि विकास और सफलता प्राप्त करने के लिए आपको वायरल होने की ज़रूरत है। जबकि वायरल होना कुछ स्टार्टअप के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है, यह ज़्यादातर व्यवसायों के लिए एक विश्वसनीय या टिकाऊ रणनीति नहीं है। वायरल होने का मतलब है कि आपका उत्पाद, सेवा या सामग्री इंटरनेट पर तेज़ी से और व्यापक रूप से फैलती है, जिससे बहुत ज़्यादा ध्यान, ट्रैफ़िक और उपयोगकर्ता मिलते हैं। हालाँकि, वायरल होने के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं, जैसे कि बढ़ी हुई लागत, स्केलेबिलिटी के मुद्दे, गुणवत्ता की समस्याएँ और ग्राहक का मंथन। इसके अलावा, वायरल होना अप्रत्याशित, बेकाबू और अल्पकालिक हो सकता है, जो आपकी पेशकश की प्रकृति और गुणवत्ता और आपके दर्शकों की प्राथमिकताओं और व्यवहार पर निर्भर करता है। इसलिए, आपको ऐसा उत्पाद या सेवा बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है जो आपके ग्राहकों को वास्तविक मूल्य प्रदान करे और उन तक पहुँचने, उन्हें बनाए रखने और उन्हें जोड़ने के लिए प्रभावी और सुसंगत तरीके खोजें।


मिथक 7: व्यवसाय शुरू करना आसान है

यह आम मिथक उद्यमिता की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता है। शुरुआती विचार से परे, व्यवसाय शुरू करने में गहन बाज़ार अनुसंधान, रणनीतिक योजना और आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए लचीलापन शामिल होता है। यह एक ऐसी यात्रा है जो रचनात्मकता और निरंतर सीखने और अनुकूलन के लिए प्रतिबद्धता की मांग करती है।


मिथक 8: स्टार्ट-अप को ऋण से वित्तपोषित नहीं किया जा सकता

यह मिथक स्टार्टअप के लिए उपलब्ध विभिन्न ऋण वित्तपोषण विकल्पों को पहचानने में विफल रहता है। बैंक ऋण से लेकर क्रेडिट लाइनों तक, आवश्यक धन प्राप्त करने के लिए कई रास्ते मौजूद हैं। विशेष कार्यक्रम और पहल अक्सर स्टार्टअप को वह वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं जिसकी उन्हें जमीन पर उतरने के लिए आवश्यकता होती है।


मिथक 9: ज़्यादातर उद्यमी आकर्षक उद्योगों में व्यवसाय शुरू करते हैं

सफलता सिर्फ़ ट्रेंडी या लोकप्रिय उद्योगों तक सीमित नहीं है। कई उद्यमियों ने कम स्पष्ट क्षेत्रों में जगह बनाकर या नए बाज़ारों में नवाचार करके सफलता पाई है, जिससे यह साबित होता है कि पारंपरिक आकर्षण से परे भी अवसर मौजूद हैं।


मिथक 10: किसी स्टार्ट-अप की वृद्धि उद्यमी की प्रतिभा पर निर्भर करती है, न कि उसके द्वारा चुने गए व्यवसाय पर उद्यमी की प्रेरणा और कौशल सेट निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी स्टार्टअप की सफलता बाजार की मांग, मापनीयता और व्यवसाय अवधारणा के प्रतिस्पर्धी माहौल पर भी बहुत अधिक निर्भर करती है। सही उद्यमी और सही व्यवसायिक विचार का संतुलित संयोजन विकास प्राप्त करने की कुंजी है।


मिथक 11: ज़्यादातर उद्यम वित्तीय रूप से सफल होते हैं

कड़वी सच्चाई यह है कि कई स्टार्टअप अपने शुरुआती वर्षों से आगे नहीं टिक पाते। उद्यमिता में वित्तीय सफलता की गारंटी नहीं होती; इसके लिए अक्सर लचीलापन, लचीलापन और असफलताओं से सीखने की क्षमता की आवश्यकता होती है। यह यात्रा सफलताओं और असफलताओं से चिह्नित होती है, जिसमें दीर्घकालिक उपलब्धि के लिए दृढ़ता एक महत्वपूर्ण कारक है।


मिथक 12: "लीन" का मतलब है कि आप सस्ते हैं या बड़ा नहीं सोच रहे हैं

ग्राहक अक्सर उत्पादों के शुरुआती पुनरावृत्तियों को "सस्ता" या, सबसे अच्छा, अपर्याप्त मानते हैं। वास्तव में, किसी उत्पाद का पहला पुनरावृत्ति - न्यूनतम व्यवहार्य उत्पाद - प्रक्रिया को ठीक करने से पहले उपभोक्ता के साथ नवाचार का परीक्षण करने का एक व्यावहारिक तरीका है। विकास प्रक्रिया में जल्दी मापना और सीखना अंततः स्टार्टअप्स के समय और संसाधनों की बचत करता है। ग्राहक शायद यह नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, रीस ने कहा, लेकिन आपके दर्शकों के साथ परिकल्पना-परीक्षण अभी भी मूल्यवान है।


मिथक 13: लीन दुनिया में वेंचर कैपिटल अनावश्यक है

लीन स्टार्टअप पद्धति अभी भी कुछ वेंचर कैपिटलिस्टों को भ्रमित करती है। वे वेंचर कैपिटल अपनी फंडिंग उन कंपनियों के लिए आरक्षित रखते हैं जो सात से 10 वर्षों के भीतर अपने पूंजी निवेश का 10 गुना रिटर्न दे सकती हैं या कम से कम नौ अंकों की निकासी क्षमता वाली फर्मों के लिए। यह व्यवसाय को बढ़ाने के लिए फंडिंग की आवश्यकता को समाप्त करता है। लीन प्रक्रिया शुरुआती स्टार्टअप चरण में पूंजी की बर्बादी को काफी कम कर सकती है, लेकिन पूंजी अभी भी आवश्यक है। अंततः, लीन प्रक्रिया स्टार्टअप संस्थापकों और वेंचर कैपिटल दोनों के लिए फायदेमंद है क्योंकि यह निवेश जोखिम और बर्न दरों को कम करती है जबकि परिणामों के मार्ग को छोटा करती है।



मिथक 14: लीन स्टार्टअप विफलता को गले लगाते हैं

कुछ लोग लीन स्टार्टअप को विफलता का लाइसेंस मानते हैं। लेकिन यह विफलता की संस्कृति को अपनाने के बारे में नहीं है; यह समझने के बारे में है कि आप दौड़ में लड़खड़ा सकते हैं और गिर सकते हैं, भले ही आप वापस उठकर खोए हुए समय की भरपाई कर सकें। वैज्ञानिक पद्धति - जो काफी हद तक लीन स्टार्टअप प्रक्रिया का आधार है - चिकित्सकों को एक नई परिकल्पना को आजमाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जब दूसरी खारिज हो जाती है। जब तक आप अपने परिणामों से सीख रहे हैं, तब तक आपको परिकल्पना को गलत करने की अनुमति है। लक्ष्य किसी भी विफलता से जितना संभव हो उतना सीखना और पूरी प्रक्रिया को तेज करना है, ताकि अधिक सफल परिणाम प्राप्त हो सके। 


मिथक 15:  आनंद का अनुसरण करें, और सफलता आपके पीछे आएगी

अपने जुनून का अनुसरण करना बहुत बढ़िया हो सकता है। लेकिन एक वास्तविक समस्या का पीछा करना और भी बड़ा पुरस्कार दे सकता है। जब आप खुद को किसी ऐसी समस्या का सामना करते हुए पाते हैं जिसे कोई और हल नहीं कर पाया है, तो आप अपने अगले साइड गिग के लिए एक ठोस विचार पर पहुँच गए हैं। जुनून एक महान प्रेरक हो सकता है, लेकिन यह स्वयं से प्रेरित होता है। आपको ऐसे अन्य लोग मिल सकते हैं जो आपके जुनून को साझा करते हैं, लेकिन आमतौर पर कई लोगों द्वारा साझा की गई समस्या को उजागर करना आसान होता है। कई सफल उत्पाद और सेवाएँ "मुझे ऐसा कुछ चाहिए था, इसलिए मैंने इसे बनाया" की मूल कहानी साझा करती हैं। दुनिया में हमेशा समस्याएँ होंगी। जबकि किसी चीज़ के लिए जुनून होना बहुत बढ़िया है, उन समस्याओं का समाधान होना अक्सर एक नए व्यवसाय उद्यम में अपने दाँत गड़ाने का एक अधिक व्यावहारिक तरीका होता है। अपने व्यवसाय की उत्पत्ति के रूप में किसी ऐसी चीज़ का उपयोग करने के बजाय जिसे लेकर आप जुनूनी हैं, पहले हल करने के लिए एक समस्या के बारे में सोचें, और फिर जुनून के साथ उस समस्या पर हमला करें।


मिथक 16: नवाचार ही राजा है

पहले स्थान पर होना जरूरी नहीं कि सफलता का टिकट हो। वास्तव में, दूसरों के पदचिन्हों पर चलना अक्सर सबसे अच्छा तरीका होता है। बिल्कुल नए विचारों से व्यवसाय बनाने वाली कंपनियों की कहानी दुर्लभ है। गूगल से पहले वेब सर्च मौजूद था। एयर बीनबी  के आने से पहले लोग काउच-सर्फिंग कर रहे थे। और एपल  मौजूदा विचारों वायरलेस नेटवर्क, मीडिया निर्माण, माउस, एमपी3 प्लेयर, स्मार्टफोन को लेकर और उन्हें वास्तव में बहुत अच्छी तरह से करने के लिए प्रसिद्ध है। जैसा कि एपल  डिज़ाइन लीड जोनाथन आइव ने कहा, "अलग होना बहुत आसान है, लेकिन बेहतर होना बहुत मुश्किल है।" अधिकांश सफल कंपनियों पर करीब से नज़र डालें और संभावना है कि आप देखेंगे कि उन्होंने मौजूदा विचार को लिया और एक बेहतर समाधान दिया।


मिथक 17: निवेशक आपके पास आएंगे और आपकी सफलता सुनिश्चित करेंगे

हालांकि यह सच है कि आपको पैसे कमाने के लिए कभी-कभी पैसे खर्च करने की ज़रूरत होती है, लेकिन आपको कितना पैसा खर्च करना पड़ता है, यह बात और भी ज़्यादा जटिल हो जाती है। नए उद्यमों का राजमार्ग उन व्यवसायों के अवशेषों से भरा पड़ा है, जो ढेर सारे बीज धन के साथ शुरू हुए थे, लेकिन कुछ खास नहीं दिखा पाए। इसका एक अच्छा उदाहरण फोटो-शेयरिंग ऐप कलर की कहानी है। इसकी शुरुआत बहुत ज़्यादा प्रचार, लगभग 40 कर्मचारियों और उतनी ही बड़ी राशि: $41 मिलियन के साथ हुई थी। एक साल से भी कम समय बाद, कंपनी ने ज़्यादातर पैसे खर्च कर दिए और दुकान बंद कर दी। इसकी तुलना इंस्टाग्राम से करें, जिसकी शुरुआत सिर्फ़ दो कर्मचारियों, नाटकीय रूप से कम राशि के साथ हुई थी और बाद में इसे फेसबुक ने $1 बिलियन में खरीद लिया। आप कितने पैसे से शुरुआत करते हैं, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप अपने पास मौजूद चीज़ों का प्रबंधन कैसे करते हैं। 

जैसा कि मार्केटिंग विशेषज्ञ गाय कावासाकी ने कहा, अगर आप सिलिकॉन वैली से निकले वाकई बेहतरीन स्टार्ट-अप को देखें, तो पाएंगे कि वे बेहद मितव्ययी रहे हैं। शुरुआती दिनों में सिस्को, गूगल, शुरुआती दिनों में याहू!, माइक्रोसॉफ्ट। मेरा मतलब है कि यह सूची लंबी होती जा रही है। कम से ज़्यादा करना और जब समझदारी हो तो निवेशकों को लेने में सावधानी बरतना आपको ज़्यादा टिकाऊ तरीके से बढ़ने और परिपक्व होने में मदद करता है।


मिथक 18: सोशल मीडिया पर व्यापक पहुंच मायने रखती है

इससे कहीं ज़्यादा फ़र्क पड़ता है कि आपके कितने फ़ॉलोअर हैं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा फ़र्क पड़ता है कि उनमें से कितने लोग वास्तव में आपका उत्पाद खरीदते हैं। अपनी सारी ऊर्जा सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फ़ॉलोअर्स जुटाने जैसे अल्पकालिक बढ़ावा पर खर्च करने के प्रलोभन में न पड़ें। इसके बजाय अपने उत्पाद या सेवा पर पूरा ध्यान दें, फिर उस ध्यान को वास्तव में रुचि रखने वाले ग्राहकों तक बढ़ाएँ।सोशल मीडिया के जंगली पश्चिम में उन इच्छुक ग्राहकों को जोड़ने का एक शानदार तरीका माइक्रो-इन्फ़्लुएंसर के ज़रिए उन तक पहुँचना है। सैकड़ों हज़ारों और कभी-कभी लाखों  फ़ॉलोअर्स वाले सेलिब्रिटी इन्फ़्लुएंसर के विपरीत, माइक्रो-इन्फ़्लुएंसर के पास कुछ सौ से लेकर कुछ हज़ार फ़ॉलोअर्स होते हैं। भले ही उनकी लोकप्रियता कम हो और वे उतने प्रसिद्ध न हों, लेकिन उनके पास काफ़ी फ़ायदा है। माइक्रो इन्फ़्लुएंसर के ज़्यादा खास दर्शकों का फ़ायदा उठाकर, आप अपने उत्पाद को ठीक अपने मनचाहे ग्राहकों तक पहुँचा सकते हैं। 


मिथक 19: आपको एक विस्तृत व्यवसाय योजना की आवश्यकता है

योजना बनाना महत्वपूर्ण है। आप जानना चाहते हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं, और आप इसे कैसे करने जा रहे हैं। लेकिन बहुत विस्तृत योजना बनाने से आप जल्दी ही उलझन में पड़ सकते हैं, जबकि आपको आगे बढ़ने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इंडीगोगो के संस्थापक स्लावा रुबिन कहते हैं, बहुत से उद्यमी परिदृश्य नियोजन और विस्तृत वित्तीय अनुमानों के साथ "सही" व्यवसाय योजना बनाने में महीनों बिता देते हैं। इन दिनों, बाजार इतनी तेज़ी से बदलते हैं कि आप कभी नहीं जानते कि ग्राहक आपके उत्पाद या सेवा पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे, या कौन सी नई तकनीकें सामने आएंगी जो व्यवसाय के माहौल को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकती हैं। यह निश्चित रूप से जानना बहुत मुश्किल है कि बाजार आपके विचार पर कैसी प्रतिक्रिया देगा। अपनी व्यवसाय योजना को तब तक सुधारने की कोशिश करने में समय लगाने के बजाय जब तक कि यह दोषरहित न हो जाए, जितनी जल्दी हो सके "वास्तविक" होने का प्रयास करें। ऐसा करने का एक तरीका एक पेज की व्यवसाय योजना बनाना है। यह त्वरित, कुशल है, और आपको तुरंत शुरू करने में मदद करता है। अपने विचार को दुनिया के सामने रखने का मतलब है कि आप जल्दी से जल्दी वास्तविक प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं, जो आपको ज़रूरत पड़ने पर सुधार करने, सुधारने और बदलाव करने का अधिक अवसर देता है। बेसकैंप के संस्थापक जेसन फ्राइड ने अपनी पुस्तक गेटिंग रियल में इस बारे में विस्तार से बात की: आप जो बना रहे हैं उसका उपयोग करते समय विवरण खुद ही प्रकट होते हैं। आप देखेंगे कि किस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। आप महसूस करेंगे कि क्या कमी है। आपको पता चल जाएगा कि किन गड्ढों को भरना है क्योंकि आप उनसे टकराते रहेंगे। यही वह समय है जब आपको ध्यान देने की आवश्यकता है, जल्दी नहीं। हो सकता है कि वह उत्पाद के बारे में बात कर रहा हो, लेकिन यह व्यवसाय योजना के लिए भी उतना ही सच है। पूर्णता के प्रति कृतज्ञ न बनें। दूसरी ओर, इसे बहुत आगे ले जाना और यह मान लेना कि आपको व्यवसाय योजना की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है, उतना ही मूर्खतापूर्ण है। आपको एक योजना की आवश्यकता है, लेकिन याद रखें कि आपकी व्यवसाय योजना एक जीवित दस्तावेज़ है। जैसे-जैसे आप पानी का परीक्षण करेंगे, यह अनुकूलित और बदलेगा।



मिथक 20: सभी ग्राहकों की एक जैसी इच्छाएँ और ज़रूरतें होती हैं

कई उद्यमी और व्यवसाय के मालिक मानते हैं कि ग्राहक एक ही समूह हैं जिनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ एक जैसी हैं। यह एक आम गलती है। वास्तविक बाज़ार डेटा और शोध का कोई विकल्प नहीं है। अपने ग्राहकों के बारे में धारणाएँ बनाना ठीक है और उन्हें क्या चाहिए या लगता है कि उन्हें क्या चाहिए, लेकिन उन्हें सत्यापित करना सुनिश्चित करें।

कई उद्यमी यह भी गलत तरीके से मानते हैं कि लोग सिर्फ़ इसलिए कुछ खरीद लेंगे क्योंकि उन्होंने कुछ बनाया है। सच्ची सफलता मौजूदा समस्या और उस समस्या का सामना कर रहे लोगों की गहरी समझ होने से मिलती है।

अपने लक्षित ग्राहकों  से जुड़ें और समझें कि उनसे कैसे बात करें और उन्हें कैसे मार्केटिंग करें। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको लोगों से सीधे पूछना है कि वे क्या चाहते हैं। जैसा कि हेनरी फोर्ड ने कहा था, "अगर मैंने लोगों से पूछा होता कि वे क्या चाहते हैं, तो वे तेज़ घोड़े कहते।" 

चाहे आप मार्केटिंग कर रहे हों, बेच रहे हों, बना रहे हों या ग्राहक सेवा प्रदान कर रहे हों, ये काल्पनिक पात्र व्यवसायों को गुमनाम संख्याओं के बजाय वास्तविक लोगों के रूप में ग्राहकों से जुड़ने में मदद करते हैं। हम अनुशंसा करते हैं कि आप अपने द्वारा बनाए जा रहे प्रत्येक व्यक्तित्व के लिए कम से कम 3 से 5 साक्षात्कारों से शुरुआत करें ताकि यह पहचाना जा सके कि आपके ग्राहक को वास्तव में क्या चाहिए। मासिक आय के आधार पर अलग - अलग लोगों की क्रयशक्ति अलग - अलग होती है अतः देश की पूरी जनसंख्या को एक ही वर्ग के उपभोक्ता नहीं मन सकते है। वे ग्राहक समूह एक-दूसरे से बहुत अलग हैं, और प्रत्येक समूह की अपनी अलग-अलग चाहत और ज़रूरतें हैं। आप निश्चित रूप से उद्यमियों और छोटे व्यवसाय मालिकों के बीच समानताओं का उपयोग अपने उत्पाद या सेवाओं को उन समूहों की ओर निर्देशित करते समय कर सकते हैं। आप एक अलग मार्केटिंग दृष्टिकोण का उपयोग करना चाहेंगे। यह सुनिश्चित करना कि आप अपने ग्राहक समूहों को उचित रूप से संबोधित कर रहे हैं, आपके बाज़ार में सफलता सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।


मिथक 21: रातों-रात सफलता का सपना

रातों-रात सफलता का सपना बस एक सपना है। ज़्यादातर सफल स्टार्टअप को ऐसे व्यवसाय बनने में सालों लग गए, जिनके बारे में आप स्टार्टअप सर्किल में बात करते सुनते हैं, जिन्हें दबी आवाज़ में ‘द वन्स टू एस्पायर टू कंपनीज़’ के नाम से जाना जाता है और ट्वीटर, ड्रॉपबॉक्स, वर्ड प्रेस, एयर बी एन बी, स्टारबक्स, इन्स्टाग्राम, फ्लिपकार्ट, जमेटो, हल्दीराम और फेसबुक, जैसे उत्पाद सफल कंपनियों के बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन्होंने सफलता के लिए धीमा और स्थिर दृष्टिकोण अपनाया।

एक सफल कंपनी बनाने में एक रात से कहीं ज़्यादा समय लगता है। जब आप कोई कंपनी शुरू करने में रुचि रखते हैं, तो आपको उसे ध्यान से बढ़ाना चाहिए ताकि ऐसा उत्पाद तैयार हो जिसके बिना लोग रह न सकें। इसमें समय लगता है! कई सबसे सफल स्टार्टअप ने यह समझा कि स्टार्टअप का रास्ता यात्रा के बारे में है, मंज़िल के बारे में नहीं।

व्यवसाय शुरू करने के लिए पहला कौशल है मार्केटिंग सेल से शुरू करे।  सेल्स से शुरू करने में कोई इंट्री पॉइन्ट बेरियर नहीं होता है। इन में पूजी की आवशयता नहीं होती। दूसरा कौशल है नेटवर्क  विकसित करना। नेटवर्किंग से आप को कोफॉउंडर, पार्टनर्स, टीम मेम्बर्स, इन्वेस्टर्स तथा कस्टमर्स मिलते है। इन स्तर पर भी को ईइंट्री पॉइन्ट बेरियर नहीं होता है। इस में पूजी की आवशयता नहीं होती।  तीसरा कौशल है अध्ययन, इससे आप को उस विषय की पूरी तकनिकी जानकारी हो जताई है जिस सेक्टर में आप काम करने बाले है।  चौथा कौशल है टीम बिल्डिँग जैसे राम को रावण से युद्ध काने के लिए टीम की  जरूरत थी  तो उनके पास लक्ष्मण जैसा कोफॉउंडर, हनुमान जैसा भक्त प्रतियोगिता  करने वाले सेवक, बिभीषण जैसा विपक्ष  की इनसाइडर जानकारी रखने वाला साथी, जटाऊ जैसा सेनानी, तथा जाम्बंत जैसे सलाहकार कर एक टीम बनाई। राम ने अपने व्यवहार से  अखंडता, विश्वास व्यक्तित्व का विकास, साझा करने की भावना, खुद के काम से दाहरण प्रस्तुत करना तथा नैतिकता को बनाएं रख कर जीत हासिल की। 

सबसे अच्छी बात है की नेता पैदा नहीं होते नेता बनते हैं। इसके लिए पांच चरण है  पहला -10,000 घंटों का विशेषज्ञ ज्ञान, दूसरा -फंड प्लानिंग, तीसरा -टीम बिल्डिंग, जैसे पाण्डवों की टीम में कृष्ण मेंटर, अर्जुन गोल अचीवर निष्पादक, भीम एचआर, युधिष्टर वित्त, तथा नकुल सहदेव बिक्री और विपणन, के लिए टीम थी, चौथा सिस्टम और स्ट्रक्चर का निर्माण करने में टेक्नोलॉजी व सॉफ्टवेयर का उपयोग करके एक प्रणाली विकसित करें, और पांचवां खुद ब्रांड व निवेशक बनें तथा धैर्य के साथ काम करें।   




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